भाषा विवाद में बढ़ी सियासत
रांची- झारखंड में भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को लेकर बना विवाद अब राजनीतिक मोड़ ले चुका है। सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय कमेटी के गठन पर ही सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भीतर भी कमेटी की निष्पक्षता को लेकर नाराज़गी दिखाई दे रही है।
‘3 बनाम 2’ का गणित क्यों बना विवाद?
बताया जा रहा है कि पांच सदस्यीय कमेटी में कांग्रेस और राजद कोटे के तीन मंत्री इन भाषाओं को शामिल करने के पक्ष में हैं, जबकि झामुमो के सिर्फ दो मंत्री इसका विरोध कर रहे हैं।
यही कारण है कि अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या कमेटी का फैसला पहले से तय था? क्या सरकार ने संख्या बल के आधार पर मनचाहा फैसला कराने की रणनीति बनाई थी?
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झामुमो मंत्रियों ने क्या कहा?
झामुमो कोटे के मंत्रियों ने कमेटी गठन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसमें आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए था।
उनका कहना है कि सरकार ने सामाजिक संतुलन बनाए बिना कमेटी का गठन किया, जिससे पूरा मामला और विवादित हो गया है।
सरकार की मंशा पर क्यों उठ रहे सवाल?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सरकार को पहले से पता था कि कमेटी में कौन मंत्री किस पक्ष में हैं। ऐसे में ‘3 बनाम 2’ का यह गणित सरकार की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है।
आलोचकों का कहना है कि अगर सरकार निष्पक्ष राय चाहती, तो कमेटी में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन भी सुनिश्चित किया जाता।
अब आगे क्या?
कमेटी की रिपोर्ट और सरकार के अगले कदम पर अब सभी की नजरें टिकी हैं। भाषा विवाद ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है।
