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“क्रॉस और पादरी एंट्री से गरमाया मुद्दा—पत्थलगड़ी पर बवाल”

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खूंटी में ‘पत्थलगड़ी’ पर विवाद: परंपरा में बदलाव को लेकर उठे सवाल

झारखंड के खूंटी जिले में पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाज पत्थलगड़ी को लेकर विवाद सामने आया है। आरोप है कि इस पारंपरिक प्रक्रिया में बदलाव करते हुए बाहरी धार्मिक प्रभाव जोड़े गए, जिससे आदिवासी पहचान और संस्कृति पर हस्तक्षेप की चिंता जताई जा रही है।

गैर-पारंपरिक समूह पर आरोप

मामले में कहा जा रहा है कि एक गैर-पारंपरिक “संयुक्त पड़हा” द्वारा पत्थलगड़ी की प्रक्रिया में बदलाव किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक विधि को अधूरा छोड़कर पादरियों द्वारा “शुद्धिकरण” जैसी प्रक्रिया कराई गई, जिसे आदिवासी धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

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क्या है पत्थलगड़ी परंपरा?

पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की एक महत्वपूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है, जो जन्म, मृत्यु और अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर की जाती है।

  • मृत्यु के बाद यह मृतक की स्मृति में आयोजित होती है
  • पत्थर पर उसके जीवन से जुड़ी जानकारी अंकित की जाती है
  • आयोजन कीली (गोत्र) पड़हा द्वारा किया जाता है
  • पाहन (पुजारी) द्वारा सिंगबोंगा और पूर्वजों से प्रार्थना की जाती है

यह पूरी प्रक्रिया आदिवासी धर्म और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा मानी जाती है।

परंपरा में बदलाव के आरोप

मामले में यह भी आरोप है कि कुछ धर्मांतरित आदिवासियों द्वारा इस परंपरा में बदलाव किए गए, जिनमें:

  • पत्थलगड़ी में क्रॉस (Cross) का चिन्ह जोड़ा गया
  • पादरियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई
  • पारंपरिक पूजा पद्धति को बदलकर नई धार्मिक प्रक्रिया अपनाई गई

इन बदलावों को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष और चिंता देखी जा रही है।

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संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा

इस पूरे मामले को आदिवासी धार्मिक अधिकारों से भी जोड़ा जा रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और PESA कानून की धारा 4(घ) के तहत आदिवासी समुदाय को अपने पारंपरिक धर्म और रीति-रिवाजों के संरक्षण का अधिकार प्राप्त है।

ऐसे में, इस तरह के बदलावों को मूल धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।

पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व पर चिंता

मामले को केवल परंपरा में बदलाव नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व से जोड़कर देखा जा रहा है।

स्थानीय जानकारों का कहना है कि यदि इस तरह के बदलाव जारी रहे, तो पारंपरिक धरोहर और सांस्कृतिक विरासत के खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।

पूर्व अधिकारी का बयान

इस मुद्दे को लेकर पूर्व पंचायती राज निदेशक (झारखंड सरकार) और IRS अधिकारी निशा उरांव ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि पत्थलगड़ी जैसी पवित्र परंपरा को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखना आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान के लिए बेहद आवश्यक है।

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