क्या सच में झारखंड में बढ़ रही है बेरोजगारी?
झारखंड में बेरोजगारी एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। हर साल लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, लेकिन नौकरी पाने वालों की संख्या बेहद कम रहती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक रोजगार का मुद्दा लगातार चर्चा में रहता है।
हालांकि सवाल यह है कि क्या वास्तव में झारखंड में बेरोजगारी बढ़ रही है, या तस्वीर कुछ अलग है? सरकारी आंकड़े और जमीनी हकीकत दोनों को देखें तो कहानी काफी दिलचस्प नजर आती है।
सरकारी आंकड़े क्या कहते हैं?
केंद्र सरकार के Periodic Labour Force Survey (PLFS) के अनुसार झारखंड का बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से कम बताया गया है। जुलाई 2024 में संसद में जारी आंकड़ों के अनुसार झारखंड की बेरोजगारी दर करीब 1.7 प्रतिशत दर्ज की गई थी, जो कई बड़े राज्यों से कम थी।
वहीं हाल के PLFS आंकड़ों में भी झारखंड को कम बेरोजगारी वाले राज्यों में शामिल किया गया। कुछ रिपोर्टों के अनुसार राज्य की बेरोजगारी दर 3 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।
पहली नजर में यह आंकड़े राहत देने वाले लगते हैं। लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल बेरोजगारी दर देखकर पूरी तस्वीर समझना मुश्किल है।
“सरकार की नई शिक्षा नीति पर भड़के शिक्षक, बोले- मरते दम तक संघर्ष करेंगे”
फिर युवाओं में इतनी नाराजगी क्यों?
असल समस्या “रोजगार की गुणवत्ता” को लेकर है। झारखंड में बड़ी संख्या में लोग खेती, दिहाड़ी मजदूरी या असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। तकनीकी रूप से वे “रोजगार” में गिने जाते हैं, लेकिन उनकी आय स्थिर नहीं होती।
यही कारण है कि लाखों पढ़े-लिखे युवा सरकारी नौकरी की तैयारी करते रहते हैं। राज्य में नियमित नियुक्तियां कम होने और परीक्षाओं में देरी के कारण युवाओं में निराशा बढ़ रही है।
रांची, धनबाद, बोकारो और जमशेदपुर जैसे शहरों में कोचिंग संस्थानों की बढ़ती संख्या भी यह दिखाती है कि रोजगार की तलाश लगातार बढ़ रही है।
खनिज संपदा के बावजूद रोजगार संकट क्यों?
झारखंड देश के सबसे खनिज संपन्न राज्यों में गिना जाता है। कोयला, लौह अयस्क और स्टील उद्योग यहां की पहचान हैं। इसके बावजूद रोजगार की स्थिति उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं हो सकी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक खनन आधारित रही, लेकिन बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर विकसित नहीं हो पाए।
इसका असर यह हुआ कि स्थानीय युवाओं को पर्याप्त रोजगार नहीं मिला और बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने लगे।
सबसे ज्यादा प्रभावित कौन?
झारखंड में बेरोजगारी का असर सबसे ज्यादा युवाओं और ग्रामीण इलाकों पर देखा जा रहा है।
ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती “स्किल और नौकरी के बीच गैप” है। कई कंपनियां अनुभवी और तकनीकी रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों की मांग करती हैं, जबकि बड़ी संख्या में युवाओं के पास केवल डिग्री होती है।
महिलाओं के रोजगार की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं कृषि और घरेलू कार्यों में लगी रहती हैं, लेकिन संगठित क्षेत्र में उनकी भागीदारी अभी भी कम है।
सरकारी योजनाओं का कितना असर?
राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों स्तर पर रोजगार बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। स्किल डेवलपमेंट, स्वरोजगार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि निवेश और उद्योगों के जरिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने भी कई मंचों पर स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की बात कही है।
हालांकि विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि नियुक्ति प्रक्रिया धीमी है और कई विभागों में हजारों पद खाली पड़े हैं।
CMIE और PLFS के आंकड़ों में अंतर क्यों?
रोजगार को लेकर अक्सर CMIE और PLFS के आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है।
CMIE निजी संस्था है, जबकि PLFS सरकारी सर्वे है। दोनों की पद्धति अलग होने के कारण आंकड़ों में अंतर आ सकता है। उदाहरण के लिए CMIE के कुछ सर्वे में बेरोजगारी दर ज्यादा दिखाई गई, जबकि PLFS में यह कम रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एक आंकड़े के आधार पर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। जमीनी स्तर पर रोजगार की गुणवत्ता, आय और स्थिरता को भी समझना जरूरी है।
आगे की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
झारखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती “स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार” पैदा करना है।
यदि राज्य केवल खनन आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहेगा तो बड़े स्तर पर रोजगार सृजन मुश्किल होगा। इसके लिए IT, मैन्युफैक्चरिंग, पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग और स्टार्टअप सेक्टर को मजबूत करना होगा।
इसके अलावा शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग को बाजार की जरूरत के हिसाब से जोड़ना भी जरूरी माना जा रहा है।
निष्कर्ष
झारखंड में बेरोजगारी को केवल आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। सरकारी रिपोर्टें भले ही कम बेरोजगारी दर दिखाएं, लेकिन जमीनी स्तर पर युवाओं की चिंता साफ दिखाई देती है।
नौकरी की तलाश में बढ़ती भीड़, भर्ती परीक्षाओं को लेकर आंदोलन और दूसरे राज्यों की ओर पलायन यह संकेत देते हैं कि रोजगार का संकट अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
आने वाले वर्षों में सरकार रोजगार सृजन और उद्योगों के विस्तार पर कितना काम करती है, यही तय करेगा कि झारखंड के युवाओं का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
