युवाओं के आंदोलनों के बाद सवाल—आखिर हमारी मंज़िल क्या है? व्यवस्था बदलने की जरूरत पर चंद्र रश्मि पिंगुआ ने उठाए सवाल
जंतर-मंतर से लेकर झारखंड तक छात्रों और युवाओं के आंदोलनों ने परीक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सरकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। इन आंदोलनों के बीच झारखंड कांग्रेस सेवा दल के प्रदेश महासचिव एवं पूर्व मेडिकल बोर्ड सदस्य चंद्र रश्मि पिंगुआ ने सवाल उठाया है कि केवल फैसले बदलने और सरकारें बदलने से क्या व्यवस्था वास्तव में बदलेगी?
प्रमुख बातें
NEET और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर युवाओं के आक्रोश का किया उल्लेख
JPSC और JSSC विवाद को लेकर झारखंड में हुए छात्र आंदोलन का दिया उदाहरण
सफल अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के साथ निष्पक्ष जांच की जरूरत पर जोर
शिक्षा और रोजगार व्यवस्था की जमीनी चुनौतियों पर उठाए गंभीर सवाल
चेहरों के बजाय पूरी व्यवस्था में सुधार को बताया जरूरी
जंतर-मंतर के आंदोलन से झारखंड तक पहुंचा युवाओं का आक्रोश
चंद्र रश्मि पिंगुआ ने अपने विचार लेख में कहा कि बीते दिनों जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके मुताबिक छात्रों के चेहरों पर परीक्षा व्यवस्था को लेकर गहरा रोष और निराशा दिखाई दे रही थी। उन्होंने NEET परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं से हजारों-लाखों छात्रों और उनके परिवारों की उम्मीदों पर असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि यह केवल प्रशासनिक विफलता का विषय नहीं है, बल्कि उन परिवारों की भावनाओं से जुड़ा मामला है, जो वर्षों की मेहनत और आर्थिक संघर्ष के बाद अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं।
JPSC-JSSC आंदोलन का भी दिया उदाहरण
पिंगुआ ने झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं को लेकर हुए छात्र आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। उनके अनुसार, युवाओं के दबाव के बाद सरकार को परीक्षाओं को लेकर बड़े फैसले लेने पड़े। हालांकि, उन्होंने इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया। उनका कहना है कि यदि किसी परीक्षा में अनियमितता के आरोप हैं और परीक्षा रद्द होती है, तो उन अभ्यर्थियों के साथ न्याय कैसे होगा जिन्होंने बिना किसी अनुचित साधन के मेहनत करके सफलता हासिल की है?
सफल अभ्यर्थियों के अधिकारों का भी हो संरक्षण
चंद्र रश्मि पिंगुआ ने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी के लिए दोषी लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसका खामियाजा उन अभ्यर्थियों को नहीं भुगतना चाहिए जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा दी और सफलता हासिल की। उन्होंने कहा कि झारखंड में परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले के खिलाफ कुछ अभ्यर्थियों का अदालत का रुख करना भी इसी चिंता से जुड़ा है। उनके मुताबिक, यदि किसी अभ्यर्थी ने पूरी ईमानदारी से परीक्षा पास की है, तो उसे किसी दूसरे की कथित गलती की सजा क्यों मिले?
“आखिर हमारी मंज़िल क्या है?”
अपने लेख में पिंगुआ ने आंदोलन की सफलता के बाद की दिशा पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि केवल किसी मंत्री का इस्तीफा या किसी सरकार का फैसला बदलना अंतिम समाधान नहीं हो सकता। सवाल यह है कि आखिर युवाओं और छात्रों के आंदोलन की वास्तविक मंजिल क्या होनी चाहिए? उन्होंने अन्ना हजारे के आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भी व्यवस्था में बड़े बदलाव की उम्मीद जगी थी। लेकिन आज भी छात्रों को अपनी मांगों के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। ऐसे में केवल चेहरों को बदलने के बजाय व्यवस्था में स्थायी सुधार की जरूरत है।
गरीब और ग्रामीण छात्रों की चुनौतियों पर भी सवाल
पिंगुआ ने कहा कि देश के दूर-दराज के इलाकों में आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। गरीब परिवार कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं और उम्मीद करते हैं कि शिक्षा के जरिए उनके बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। उन्होंने खास तौर पर बेटियों की चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि सामाजिक दबाव के बावजूद कई बेटियां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती हैं। लेकिन जब वे परीक्षा के लिए तैयार होती हैं, तो कभी भर्ती नहीं निकलने, कभी परीक्षा में कथित गड़बड़ी और कभी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने जैसी परिस्थितियां उनके सामने आ जाती हैं।
सिस्टम, सरकार या समाज—जिम्मेदार कौन?
चंद्र रश्मि पिंगुआ ने सवाल उठाया कि युवाओं के भविष्य से जुड़ी इन समस्याओं के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है—व्यवस्था, सरकार या समाज स्वयं? उन्होंने इसे गंभीर आत्मविश्लेषण का विषय बताया। उनका कहना है कि जब तक आंदोलन केवल सरकार या किसी व्यक्ति को बदलने तक सीमित रहेंगे, तब तक स्थायी समाधान मुश्किल होगा। इसके लिए परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, भर्ती प्रक्रिया में भरोसा, जवाबदेही और शिक्षा की जमीनी स्थिति में सुधार जरूरी है।
“व्यवस्था सुधारने का संकल्प लेना होगा”
पिंगुआ ने कहा कि युवाओं के आंदोलन निश्चित तौर पर व्यवस्था के प्रति जागरूकता और दबाव बनाने की ताकत दिखाते हैं, लेकिन आंदोलन की वास्तविक सफलता तभी होगी जब उसके बाद ऐसी व्यवस्था तैयार हो, जिसमें छात्रों को बार-बार अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने की जरूरत न पड़े। उन्होंने कहा कि चेहरों और सरकारों को बदलने के बजाय पूरी व्यवस्था को सुधारने और जमीनी परिस्थितियों को बदलने का संकल्प लेना होगा। तभी युवाओं के आंदोलनों को उनकी वास्तविक मंजिल मिल सकेगी।
लेखक: चंद्र रश्मि पिंगुआ, पूर्व मेडिकल बोर्ड सदस्य एवं झारखंड कांग्रेस सेवा दल प्रदेश महासचिव
