अनुदान बढ़ोतरी पर निर्णय लंबित: 600 स्कूल–इंटर कॉलेजों ने अनुदान प्रपत्र न भरने का ऐलान
रांची।
राज्य सरकार द्वारा वित्त–रहित अनुदानित स्कूलों और इंटर कॉलेजों के 75% अनुदान वृद्धि प्रस्ताव पर अब तक निर्णय नहीं लेने से नाराज़ शिक्षण संस्थानों ने बड़ा कदम उठाया है। मोर्चा के अध्यक्ष मंडल ने सर्वसम्मति से तय किया है कि जब तक राज्य कैबिनेट इस प्रस्ताव पर निर्णय नहीं लेती, तब तक राज्य के 600 स्कूल और इंटर कॉलेज आगामी वित्तीय वर्ष 2025–26 के अनुदान प्रपत्र नहीं भरेंगे।
यह निर्णय आज अध्यक्ष मंडल की बैठक में लिया गया। इससे पहले 18 नवंबर 2025 को प्राचार्य, प्रधानाचार्य और शिक्षक प्रतिनिधियों की बैठक में अनुदान प्रपत्र न भरने का प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें 500 से अधिक संस्थानों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। आज अध्यक्ष मंडल ने इस प्रस्ताव पर औपचारिक मुहर लगा दी।
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195 इंटर कॉलेज, 334 उच्च विद्यालय, 40 संस्कृत व 46 मदरसा स्कूल होंगे शामिल
बैठक में निर्णय लिया गया कि संलेख प्रस्ताव पर कैबिनेट में चर्चा और अंतिम सहमति होने तक 195 इंटर कॉलेज, 334 उच्च विद्यालय, 40 संस्कृत विद्यालय और 46 मदरसा विद्यालय अनुदान से संबंधित कोई प्रपत्र नहीं भरेंगे।
इन संस्थानों में तीन से चार लाख तक छात्र–छात्राएं पढ़ते हैं, जिनमें अधिकांश ग्रामीण और गरीब तबके के बच्चे शामिल हैं।
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क्या है मामला?
वर्ष 2022 में राज्य सरकार ने महंगाई को देखते हुए वित्त–रहित अनुदानित स्कूलों और इंटर कॉलेजों के अनुदान में 75% वृद्धि का निर्णय लिया था। इसके लिए स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने एक कमेटी बनाई थी, जिसके अध्यक्ष निदेशक, माध्यमिक शिक्षा थे।
इसी अवधि में संबद्ध डिग्री कॉलेजों के अनुदान में भी 75% वृद्धि का प्रस्ताव आया। चूंकि डिग्री कॉलेजों को अनुदान 2004 अधिनियम के तहत मिलता है, इसलिए उनका प्रस्ताव तेज़ी से आगे बढ़ा। उस समय उच्च शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पास था और वित्तीय वर्ष 2023–24 में डिग्री कॉलेजों को इस बढ़ोतरी का लाभ मिल गया।
इसके विपरीत, स्कूल–इंटर कॉलेजों के संलेख प्रस्ताव को वित्त और विधि विभाग की सहमति मिलने के बाद शिक्षा विभाग ने कैबिनेट को भेजा, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसे पुनः “विमर्श” के लिए विभाग को लौटा दिया।
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शिक्षकों को मिलता है बेहद कम अनुदान
स्कूल–इंटर कॉलेजों के शिक्षकों को वर्तमान में नाममात्र का अनुदान मिलता है—
इंटर कॉलेज शिक्षकों को ₹7,000–₹8,000 मासिक
उच्च विद्यालय, संस्कृत विद्यालय और मदरसा शिक्षकों को ₹3,000–₹4,000 मासिक
शिक्षकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में इतनी अल्प राशि में परिवार चलाना संभव नहीं है। वर्ष 2015 से अब तक इन संस्थानों के अनुदान में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं हुई है।
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अनुदान प्रक्रिया में अनियमितता का आरोप
बैठक में सदस्यों ने आरोप लगाया कि अनुदान भेजने की प्रक्रिया “जटिल और भ्रष्टाचार–ग्रस्त” हो चुकी है।
उनके अनुसार, 10–15% राशि जिला ट्रेजरी, डीईओ कार्यालय, आरडीडीई कार्यालय और बिचौलियों की परतों में ही समाप्त हो जाती है।
संस्थाओं का कहना है कि 2017–18 के पहले अनुदान सीधे संस्थाओं के खातों में भेजा जाता था, जिससे गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं रहती थी। अब हालात इसके उलट हो चुके हैं।
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अपीलिये आवेदन और 12% बकाया राशि भी लंबित
मोर्चा ने यह भी कहा कि अपीलिये आवेदन और 12% बकाया राशि का भुगतान हुए एक माह होने को है, फिर भी संस्थानों को पैसा नहीं मिला है।
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वेतनमान पर भी कार्रवाई लंबित
कार्मिक विभाग ने 17 मार्च 2025 को वित्त–रहित शिक्षा नीति समाप्त कर वेतनमान देने का प्रस्ताव स्कूली शिक्षा विभाग को भेजा था। मुख्यमंत्री ने सदन में भी इस संबंध में आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं हुई है।
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सावित्रीबाई फुले बालिका समृद्धि योजना भी रुकी
बैठक में यह भी बताया गया कि इस वर्ष सावित्रीबाई फुले बालिका समृद्धि योजना की राशि भी रोक दी गई है, जिससे कक्षा 8 से 12 तक की एक लाख से अधिक छात्राएं प्रभावित हुई हैं।
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बैठक में ये रहे उपस्थित
अध्यक्ष मंडल की बैठक में कुंदन कुमार सिंह, रघुनाथ सिंह, हरिहर प्रसाद कुशवाहा, फजलुल कदीर अहमद, चंदेश्वर पाठक, डॉ. देवनाथ सिंह, अरविंद सिंह, डालेश चौधरी, मनीष कुमार, मनोज तिर्की, पशुपति महतो, विनय उरांव, रेशमा बैक, मुरारी प्रसाद सिंह, नरोत्तम सिंह, संजय कुमार, रघु विश्वकर्मा एवं रणजीत मिश्रा उपस्थित थे।
