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“13 महीने से इंतजार!” अब सरकार के खिलाफ मैदान में उतरे प्रशिक्षक

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13 महीने से मानदेय नहीं मिलने पर फूटा व्यवसायिक प्रशिक्षकों का गुस्सा, JEPC कार्यालय का घेराव

रांची में व्यवसायिक प्रशिक्षकों का प्रदर्शन

झारखंड के विभिन्न विद्यालयों में कार्यरत व्यवसायिक प्रशिक्षकों ने 13 महीने से बकाया मानदेय की मांग को लेकर सोमवार को रांची पहुंचकर झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JEPC) कार्यालय का घेराव किया। प्रदर्शन में बड़ी संख्या में प्रशिक्षक शामिल हुए और सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की गई।

प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा कि जब तक बकाया भुगतान नहीं होगा, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।

आंदोलन को मिला देवेन्द्र नाथ महतो का समर्थन

प्रदर्शन को JLKM के केंद्रीय वरीय उपाध्यक्ष और आंदोलनकारी नेता Devendra Nath Mahato का समर्थन मिला। मौके पर उन्होंने कहा कि झारखंड के विभिन्न जिलों में कार्यरत व्यवसायिक प्रशिक्षक राज्य वित्तपोषित हैं और लगातार अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि प्रशिक्षक गरीब और ग्रामीण विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण व्यावसायिक शिक्षा देने का काम कर रहे हैं, लेकिन लंबे समय से मानदेय नहीं मिलने के कारण उनके परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं।

JEPC निदेशक को सौंपा मांग पत्र

प्रदर्शन के दौरान प्रशिक्षकों ने JEPC निदेशक शशि रंजन को मांग पत्र सौंपा। प्रशिक्षकों ने चेतावनी दी कि अगर जल्द भुगतान नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।

संघ के पदाधिकारियों ने विभाग पर लगातार उपेक्षा का आरोप लगाया। उनका कहना है कि कई बार विभाग को समस्या से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

“भुगतान तक आंदोलन जारी रहेगा”

झारखंड राज्य वित्तपोषित व्यवसायिक प्रशिक्षक संघ के अध्यक्ष देव प्रकाश, उपाध्यक्ष प्राण सौरभ, सचिव मनोज कुमार महतो और कोषाध्यक्ष अमरेंद्र कुमार ने संयुक्त रूप से कहा कि इस बार सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि भुगतान चाहिए।

उन्होंने घोषणा की कि मानदेय जारी होने तक आंदोलन जारी रहेगा और मंगलवार को रांची में बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया जाएगा।

बढ़ सकता है आंदोलन

प्रशिक्षकों के आंदोलन को देखते हुए आने वाले दिनों में यह मुद्दा और बड़ा रूप ले सकता है। लंबे समय से वेतन नहीं मिलने का मामला अब राजनीतिक रंग भी पकड़ता दिख रहा है। प्रशिक्षकों का कहना है कि आर्थिक संकट के बावजूद वे लगातार शिक्षा व्यवस्था को संभाल रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही।

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