बंगाल में भाजपा की जीत और हिंसा पर सियासत तेज, बाबूलाल मरांडी के बयान पर उठे सवाल
भाजपा कार्यकर्ताओं के संघर्ष को बताया ‘बलिदान’
झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi से जुड़ा एक बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। बयान में दावा किया गया कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का विस्तार केवल चुनावी प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के वर्षों के संघर्ष, हिंसा और बलिदान का नतीजा है।
बयान में कहा गया कि 2011 से 2025 तक भाजपा कार्यकर्ताओं ने राजनीतिक हिंसा, हमलों, फर्जी मुकदमों और सामाजिक बहिष्कार का सामना किया। नंदीग्राम, बीरभूम, कूचबिहार और बशीरहाट जैसे इलाकों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया कि भाजपा समर्थकों को निशाना बनाया गया और कई परिवारों को विस्थापन तक झेलना पड़ा।
‘शून्य से शिखर’ तक पहुंचने का दावा
बयान में भाजपा की चुनावी यात्रा को संघर्षपूर्ण बताते हुए पार्टी के आंकड़े भी गिनाए गए। इसमें 2011 में एक विधायक से लेकर 2021 में 77 विधायकों तक पहुंचने और 2024 लोकसभा चुनाव में भी प्रभाव बनाए रखने का दावा किया गया। समर्थकों ने इसे “कार्यकर्ताओं की तपस्या” और “राजनीतिक बलिदान” की जीत बताया।
हिंसा पर भाजपा की चुप्पी को लेकर विपक्ष के सवाल
हालांकि, इस बयान के बाद विपक्षी दलों और सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि यदि भाजपा अब सत्ता में है या प्रभावशाली स्थिति में पहुंच चुकी है, तो मौजूदा राजनीतिक हिंसा की घटनाओं पर पार्टी की ओर से स्पष्ट प्रतिक्रिया क्यों नहीं आ रही।
विपक्ष का आरोप है कि भाजपा नेताओं को यह भी बताना चाहिए कि सत्ता परिवर्तन या राजनीतिक मजबूती के बाद भी हिंसा क्यों जारी है। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह राजनीतिक प्रतिशोध की राजनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
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बंगाल की राजनीति में हिंसा पुराना मुद्दा
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से राजनीतिक हिंसा के आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच रही है। पहले वाम दलों और बाद में तृणमूल कांग्रेस तथा भाजपा के बीच टकराव लगातार बढ़ता गया। चुनावों के दौरान केंद्रीय बलों की तैनाती, अदालतों की निगरानी और जांच एजेंसियों की सक्रियता भी कई बार चर्चा में रही है।
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राजनीतिक बयानबाजी से बढ़ी बहस
विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के भावनात्मक और आक्रामक राजनीतिक बयान बंगाल की पहले से संवेदनशील राजनीति को और गर्मा सकते हैं। भाजपा जहां इसे कार्यकर्ताओं के संघर्ष की कहानी बता रही है, वहीं विरोधी दल इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण की रणनीति करार दे रहे हैं।
