TET को लेकर शिक्षकों में बढ़ी चिंता, संयुक्त शिक्षक मोर्चा बोला- 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को मिले राहत
सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका और टीईटी से जुड़े आदेशों के बाद झारखंड सहित देशभर के लाखों प्राथमिक शिक्षक असमंजस की स्थिति में हैं। झारखंड प्रदेश संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने इस पूरे मामले के लिए केंद्र और राज्य सरकार की नीतिगत अस्पष्टता को जिम्मेदार ठहराया है।
मोर्चा ने मांग की है कि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी परीक्षा से छूट दी जाए या फिर उनके लिए अलग से विशेष टीईटी परीक्षा आयोजित की जाए ताकि शिक्षकों के बीच व्याप्त भ्रम और चिंता दूर हो सके।
प्रमुख बातें
- 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों के भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता।
- संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने सरकार की नीतिगत अस्पष्टता पर उठाए सवाल।
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद शिक्षकों में असुरक्षा की भावना।
- मोर्चा ने विशेष टीईटी परीक्षा आयोजित करने की मांग की।
- शिक्षकों को परीक्षा से नहीं, बल्कि दिशा-निर्देशों के अभाव से परेशानी।
क्या है पूरा मामला?
संयुक्त शिक्षक मोर्चा के प्रदेश संयोजक अमीन अहमद, विजय बहादुर सिंह, आशुतोष कुमार और प्रदेश प्रवक्ता अरुण कुमार दास ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) 2009 लागू होने के बाद प्राथमिक शिक्षा को दो भागों में विभाजित किया गया। इसके तहत कक्षा 1 से 5 तक को प्राथमिक और कक्षा 6 से 8 तक को उच्च प्राथमिक श्रेणी में रखा गया।
इसके बाद शिक्षक नियुक्ति के लिए अलग-अलग शैक्षणिक और प्रशिक्षण योग्यताएं निर्धारित की गईं। साथ ही शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को भी अनिवार्य बनाया गया। हालांकि 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों को प्रारंभिक रूप से टीईटी से छूट प्रदान की गई थी।
2017 के संशोधन के बाद बढ़ी समस्या
मोर्चा का कहना है कि अगस्त 2017 में आरटीई अधिनियम में संशोधन करते हुए पहले से नियुक्त शिक्षकों के लिए भी टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन इसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने न तो कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए और न ही शिक्षकों के लिए परीक्षा प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस व्यवस्था बनाई।
शिक्षक संगठनों का आरोप है कि वर्षों बीत जाने के बावजूद सरकार ने इस संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट नीति नहीं बनाई, जिसके कारण लाखों शिक्षक अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
अगस्त 2028 की समय सीमा से बढ़ी बेचैनी
मोर्चा के नेताओं ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार अगस्त 2028 तक टीईटी उत्तीर्ण नहीं करने वाले शिक्षकों पर सेवा समाप्ति की तलवार लटक रही है। ऐसे में वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
उनका कहना है कि यदि शिक्षक ही अपने भविष्य को लेकर चिंतित रहेंगे तो इसका असर शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के भविष्य पर भी पड़ सकता है।
25-30 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षक
संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने कहा कि राज्य के हजारों शिक्षक बीपीएससी, जेपीएससी और अन्य चयन प्रक्रियाओं के माध्यम से नियुक्त हुए हैं। इनमें से कई शिक्षक 25 से 30 वर्षों से सरकारी विद्यालयों में सेवा दे रहे हैं और लाखों विद्यार्थियों का भविष्य संवार चुके हैं।
इसके बावजूद अब उन्हें अपने करियर के अंतिम चरण में नई परीक्षा व्यवस्था की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
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“परीक्षा से नहीं, अस्पष्टता से है परेशानी”
मोर्चा ने स्पष्ट किया कि शिक्षक किसी भी परीक्षा से घबराते नहीं हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षक लगातार निष्ठा, दीक्षा, जे गुरुजी और सेंटा जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रशिक्षण और मूल्यांकन कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं।
नेताओं ने कहा कि शिक्षकों ने समय-समय पर अपनी दक्षता साबित की है। ऐसे में समस्या परीक्षा नहीं बल्कि सरकार द्वारा समय पर दिशा-निर्देश जारी नहीं करना है।
जे-टेट 2026 नियमावली पर भी उठे सवाल
मोर्चा ने झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) 2026 की नियमावली पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि वर्तमान विज्ञापन में दो वर्षीय शिक्षक प्रशिक्षण को अनिवार्य योग्यता बनाया गया है, जबकि पहले नियुक्त कई शिक्षकों के पास एक वर्षीय सेवाकालीन प्रशिक्षण है।
इसके अलावा नियमावली के पैरा-19 में कार्यरत शिक्षकों के लिए अलग से परीक्षा आयोजित करने का प्रावधान तो किया गया है, लेकिन उनकी शैक्षणिक योग्यता और पात्रता को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिए गए हैं।
सरकार से क्या है मांग?
संयुक्त शिक्षक मोर्चा ने राज्य और केंद्र सरकार से मांग की है कि 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों की सेवा शर्तों को ध्यान में रखते हुए विशेष कानूनी व्यवस्था की जाए।
संगठन ने कहा कि या तो ऐसे शिक्षकों को टीईटी परीक्षा से मुक्त रखा जाए अथवा उनके लिए अलग से विशेष टीईटी परीक्षा आयोजित की जाए। इससे शिक्षकों के बीच व्याप्त भ्रम समाप्त होगा और स्कूलों में शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी।
आंदोलन की चेतावनी
मोर्चा ने कहा कि परीक्षा आयोजित करना, पाठ्यक्रम तैयार करना और दिशा-निर्देश जारी करना विभाग की जिम्मेदारी है। यदि सरकार समय रहते समाधान नहीं निकालती है तो शिक्षकों को आंदोलन करने अथवा न्यायालय की शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
संगठन ने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द ही इस मुद्दे पर स्पष्ट नीति बनाकर शिक्षकों और शिक्षा व्यवस्था दोनों के हित में निर्णय लेगी।
