धर्मांतरण के बाद पाहन पद पर क्यों मचा विवाद? निशा उरांव के बयान से गरमाई बहस

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धर्मांतरण के बाद पारंपरिक पदों पर क्यों उठ रहे सवाल?

झारखंड में एक बार फिर धर्मांतरण और आदिवासी पारंपरिक व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। इस बार चर्चा का केंद्र बनी हैं पूर्व पंचायती राज निदेशक एवं वर्तमान IRS अधिकारी Nisha Oraon, जिन्होंने धर्मांतरित आदिवासियों के पारंपरिक पदों पर बने रहने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।

उन्होंने कहा कि यदि चर्च में आस्था बदलने के बाद कोई व्यक्ति पादरी नहीं रह सकता, तो आदिवासी समाज में धर्मांतरण के बाद पाहन जैसे धार्मिक पदों पर बने रहना भी उचित नहीं माना जाना चाहिए।

“ग्रामसभा सिर्फ प्रशासनिक संस्था नहीं”

निष्ठा उरांव के अनुसार ग्रामसभा केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है।

उनका कहना है कि पाहन, मांझी, महतो जैसे पारंपरिक पद केवल सामाजिक नेतृत्व तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनकी जिम्मेदारी धार्मिक अनुष्ठानों और पारंपरिक आस्था से भी जुड़ी होती है।

ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अपनी मूल पारंपरिक आस्था छोड़ चुका है, तो वह धार्मिक जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से कैसे निभा सकता है — यही बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है।

“पहनाई जमीन और लाभ के कारण नहीं छोड़ा जा रहा पद?”

अपने बयान में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई मामलों में लोग पारंपरिक पदों से मिलने वाले लाभ और “पहनाई जमीन” के कारण पद छोड़ना नहीं चाहते।

उनके मुताबिक,

“धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया जाता है, इसलिए नैतिक रूप से पारंपरिक धार्मिक पद भी छोड़ देना चाहिए। दोहरा मापदंड नहीं चल सकता।”

यह बयान अब आदिवासी समाज के भीतर नई बहस को जन्म दे रहा है।

समाज दो हिस्सों में बंटा

इस मुद्दे पर आदिवासी समाज के भीतर अलग-अलग राय सामने आ रही है।

एक पक्ष क्या कह रहा?

  • पारंपरिक पदों का संबंध सरना आस्था और रीति-रिवाजों से है
  • धर्मांतरण के बाद धार्मिक जिम्मेदारियाँ निभाना संभव नहीं
  • परंपरा और संस्कृति बचाने के लिए स्पष्ट नियम जरूरी

दूसरा पक्ष क्या मानता है?

  • संविधान हर व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता देता है
  • पारंपरिक पद सामाजिक नेतृत्व का भी हिस्सा हैं
  • किसी को केवल धर्म के आधार पर बाहर करना उचित नहीं

झारखंड की राजनीति में भी गरमा सकता है मुद्दा

आदिवासी पहचान, सरना धर्म कोड और धर्मांतरण जैसे मुद्दे पहले से ही झारखंड की राजनीति में संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में निष्ठा उरांव का यह बयान आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक बहस को और तेज कर सकता है।

अब बड़ा सवाल यही है —
क्या पारंपरिक आदिवासी पद केवल सामाजिक व्यवस्था हैं, या फिर वे पूरी तरह धार्मिक आस्था से जुड़े पद हैं?

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