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“उलगुलान 2.0” शुरू! खूंटी से उठी आदिवासी पहचान बचाने की लड़ाई

झारखंड/बिहार ताज़ा ख़बर

“उलगुलान 2.0” शुरू! खूंटी से उठा आदिवासी पहचान बचाने का आंदोलन, ‘सामाजिक डीलिस्टिंग’ की मांग तेज

झारखंड के खूंटी जिले से एक बार फिर “उलगुलान” की गूंज सुनाई दे रही है। हालांकि इस बार यह आंदोलन तीर-धनुष से नहीं, बल्कि कानून और संवैधानिक अधिकारों के जरिए लड़ा जाएगा। आदिवासी समाज ने अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा के लिए एक बड़े सामाजिक आंदोलन की शुरुआत कर दी है।

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बिरसा की धरती से फिर उलगुलान

यह आंदोलन उसी धरती से शुरू हुआ है, जहां से भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक उलगुलान किया था।

फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार लड़ाई हथियारों से नहीं, बल्कि कानून और अधिकारों के जरिए लड़ी जा रही है।

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प्रशासन को सौंपा गया ज्ञापन

आंदोलन को औपचारिक रूप देते हुए समाज के अगुआओं ने खूंटी जिला उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा।

इसके जरिए उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि अपनी परंपरा, आस्था और अस्तित्व को बचाने के लिए है।

ग्राम सभा को लेकर बड़ा विवाद

सबसे बड़ा मुद्दा ग्राम सभा की पहचान को लेकर उठाया गया है।

  • ग्राम सभा को सिर्फ प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि सामाजिक-धार्मिक संस्था माना जाए
  • PESA Act और संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 29 के तहत पारंपरिक अधिकारों की रक्षा हो

यानी साफ है कि यह लड़ाई “शासन vs परंपरा” की दिशा में बढ़ती दिख रही है।

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“सामाजिक डीलिस्टिंग” की मांग ने बढ़ाया विवाद

आंदोलन का सबसे विवादित पहलू “सामाजिक डीलिस्टिंग” है।

 समाज का दावा है कि धर्मांतरित आदिवासी पारंपरिक पदों पर नहीं होने चाहिए, क्योंकि:

  • इन पदों में धार्मिक जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं
  • धर्मांतरित व्यक्ति सामाजिक भूमिका निभा सकता है, लेकिन धार्मिक नहीं

इसी वजह से कई जगहों पर पाहन, ग्राम प्रधान जैसे पदों पर नियुक्तियों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई गई है।

‘Cultural Hegemony’ का आरोप

आंदोलनकारियों ने “मॉडल ग्राम सभा” और “संयुक्त पड़हा” जैसी नई संरचनाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया है।

उनका आरोप है कि:

  • ये संरचनाएं पारंपरिक नहीं हैं
  • यह सांस्कृतिक घुसपैठ (Cultural Hegemony) है
  • आदिवासी पहचान पर कब्जा करने की साजिश है

जमीन और धार्मिक पदों पर भी सवाल

मामला सिर्फ पदों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन तक पहुंच गया है।

आरोप है कि:

  • पाहन जैसे धार्मिक पदों पर भी धर्मांतरित लोग बैठे हैं
  • भुईंहारी और खूँटकट्टी जैसी पारंपरिक जमीनों पर कब्जा है

 प्रशासन से मांग की गई है कि इन जमीनों को ग्राम सभा के नियंत्रण में वापस दिलाया जाए।

केवल पारंपरिक ग्राम सभा को मान्यता देने की मांग

समाज ने स्पष्ट कहा है कि:

  • सिर्फ पारंपरिक ग्राम सभा को मान्यता मिले
  • मुंडा, पाहन, महतो जैसे पद रूढ़ियों के अनुसार ही नियुक्त हों
  • जिला स्तर की टीम में पारंपरिक अगुआओं को शामिल किया जाए

इससे साफ है कि यह आंदोलन प्रशासनिक ढांचे को भी चुनौती दे रहा है।

राज्यभर में फैल सकता है आंदोलन

सबसे अहम बात यह है कि यह आंदोलन सिर्फ खूंटी तक सीमित नहीं रहेगा।

समाज ने ऐलान किया है कि इसे झारखंड के सभी जिलों में फैलाया जाएगा।

निष्कर्ष: पहचान बनाम व्यवस्था की सीधी टक्कर

एक तरफ संविधान और कानून की व्याख्या है, तो दूसरी तरफ परंपरा और पहचान की रक्षा का सवाल।

खूंटी से शुरू हुआ यह “उलगुलान 2.0” आने वाले समय में झारखंड की राजनीति और सामाजिक संरचना पर बड़ा असर डाल सकता है।

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