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“रांची में राष्ट्रीय मंथन: आधार बना सहारा या बना बाधा?”

झारखंड/बिहार राष्ट्रीय ख़बर

रांची में ‘आधार, डिजिटल अधिकार और सामाजिक सुरक्षा’ पर राष्ट्रीय परामर्श संपन्न

रांची, झारखंड: आधार प्रणाली और उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीर मंथन के साथ दो दिवसीय राष्ट्रीय परामर्श का सफल समापन हुआ। LibTech India द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन 15 और 16 अप्रैल 2026 को रांची स्थित नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL) के सहयोग से किया गया।

इस परामर्श में देशभर के स्वतंत्र शोधकर्ताओं, सिविल सोसायटी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आधार प्रणाली के वास्तविक प्रभावों और जमीनी अनुभवों के बीच की खाई को समझना और पाटना था।

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आधार पर दो राय: कुशलता बनाम जमीनी चुनौतियां

जहां एक ओर आधार प्रणाली के समर्थक इसे प्रशासनिक दक्षता का मजबूत साधन बताते हैं, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आए तथ्य एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं।

परामर्श में यह मुद्दे प्रमुखता से उठे:

  • बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की विफलता
  • भुगतान अस्वीकृति
  • डेटाबेस से नामों का गलत तरीके से हटाया जाना

इन समस्याओं के कारण कई जरूरतमंद लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो चिंता का विषय है।

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पहला दिन: उद्घाटन, शोध रिपोर्ट और कार्यशाला

कार्यक्रम का उद्घाटन NUSRL के कुलपति प्रो. (डॉ.) अशोक आर. पाटिल और UIDAI झारखंड के निदेशक नीरज कुमार ने किया। दोनों ने आधार की उपयोगिता को स्वीकारते हुए उसकी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला।

शोध और प्रस्तुतियाँ

प्रमुख अर्थशास्त्री प्रो. ज्यां द्रेज़ ने अपने विस्तृत शोध के आधार पर बताया कि आधार का जनकल्याणकारी योजनाओं पर क्या प्रभाव पड़ा है।
इसके बाद LibTech India की टीम ने आंध्र प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और तेलंगाना में किए गए अपने फील्ड स्टडी के निष्कर्ष साझा किए।

विषयगत कार्यशाला

दोपहर में आयोजित कार्यशाला में प्रतिभागियों को अलग-अलग समूहों में बांटकर इन मुद्दों पर चर्चा की गई:

  • आधार नामांकन और अपडेट
  • तकनीकी और बुनियादी ढांचा
  • आधार सीडिंग और प्रमाणीकरण
  • शिकायत निवारण प्रणाली
  • सूचना और जागरूकता

इन चर्चाओं से कई व्यावहारिक समाधान और नीतिगत सुझाव सामने आए।

दूसरा दिन: पैनल चर्चा और जमीनी अनुभव

दूसरे दिन की शुरुआत विभिन्न राज्यों से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं और संस्थाओं के प्रतिनिधियों की पैनल चर्चा से हुई।

प्रमुख वक्ताओं के विचार

  • साबिर अहमद (SABAR Institute): आधार और स्कूल नामांकन के बीच संबंध
  • संजना सक्सेना व मयंक प्रताप (Indus Action): महिला श्रमिकों के मातृत्व लाभ में आधार की भूमिका
  • परमिता पांजल (Graamvani): सूचना की कमी से उत्पन्न समस्याएँ
  • स्वाति जाधव (Work Fair and Free): प्रवासी श्रमिकों की चुनौतियाँ
  • वेंकट कृष्ण (जनजातीय कल्याण विभाग, आंध्र प्रदेश): आदिवासी क्षेत्रों में आधार सेवाओं की पहुंच

इन वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि आधार का प्रभाव अलग-अलग समुदायों पर अलग तरह से पड़ रहा है।

विशेष संबोधन और कार्य योजना

नरेगा वाच के संयोजक जेम्स हेरेंज ने अपने संबोधन में कहा कि इस परामर्श से निकले निष्कर्षों को जमीनी स्तर पर लागू करना बेहद जरूरी है।

इसके बाद विभिन्न संगठनों—अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, मजदूर किसान शक्ति संगठन, Rethink Aadhaar और Karra Society—के प्रतिनिधियों ने मिलकर एक कार्य-योजना (Action Plan) प्रस्तुत की, जिसमें भविष्य की जिम्मेदारियों और रणनीतियों का खाका तैयार किया गया।

समापन: आगे की राह पर जोर

कार्यक्रम का समापन NUSRL के सहायक कुलसचिव डॉ. जिशु केतन पट्टनायक के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

परामर्श में यह स्पष्ट हुआ कि आधार प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है, ताकि यह वास्तव में समाज के हर वर्ग तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।

निष्कर्ष

यह दो दिवसीय परामर्श केवल एक अकादमिक चर्चा नहीं था, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ जहां डिजिटल पहचान, सामाजिक सुरक्षा और जमीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाने की दिशा में ठोस कदम सुझाए गए।

अब देखने वाली बात होगी कि इन सुझावों को नीति और व्यवहार में कितनी तेजी से लागू किया जाता है।

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