झारखंड के मांदर को मिला GI टैग! देशभर में बढ़ा आदिवासी विरासत का मान

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झारखंड के मांदर को मिली बड़ी पहचान, GI टैग से बढ़ा लोकवाद्य का गौरव

सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा को मिला भौगोलिक संकेतक दर्जा, गुमला के कारीगरों की विरासत को भी मिलेगी पहचान
झारखंड की लोकसंस्कृति और आदिवासी परंपरा से गहराई से जुड़े मांदर को भौगोलिक संकेतक (GI) दर्जा मिल गया है। भारत सरकार के Geographical Indications Registry, चेन्नई की ओर से मांदर ऑफ झारखंड को पंजीकृत किया गया है। GI रिकॉर्ड के अनुसार इसका आवेदन संख्या 777 है और आवेदक Raidih Mandar Producer Company Limited है।


प्रमुख बातें
झारखंड के पारंपरिक लोकवाद्य मांदर को GI दर्जा मिला।
GI आवेदन वर्ष 2021 में दाखिल किया गया था।
आवेदन संख्या 777 और स्टेटस Registered दर्ज है।
आवेदक Raidih Mandar Producer Company Limited, गुमला है।
मांदर की खास बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण पद्धति और विशिष्ट ध्वनि को आवेदन में आधार बनाया गया।

मांदर को झारखंड की लोक परंपरा, नृत्य और सांस्कृतिक जीवन से जोड़ने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज भी पेश किए गए।
GI प्रक्रिया में डॉ. सत्यदीप सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है।
झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई मान्यता
मांदर झारखंड के पारंपरिक लोकवाद्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह राज्य की लोक परंपराओं, नृत्य और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। GI आवेदन में मांदर की विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक, इसकी ध्वनि और झारखंड के साथ इसके गहरे सांस्कृतिक संबंध को प्रमाणित किया गया।


2021 में दाखिल हुआ था GI आवेदन
दस्तावेजों के मुताबिक मांदर के GI दर्जे के लिए आवेदन 24 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था। GI रिकॉर्ड में इसे Class 15 – Handicrafts के तहत दर्ज किया गया है और भौगोलिक क्षेत्र के रूप में झारखंड का उल्लेख है। आवेदनकर्ता Raidih Mandar Producer Company Limited है, जिसका पता रायडीह, गुमला में दर्ज है। आवेदन में मांदर की विशेष बनावट, स्थानीय लाल मिट्टी के इस्तेमाल, पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया, विशिष्ट ध्वनि और झारखंड के विभिन्न जनजातीय समुदायों के साथ इसके लंबे संबंध का उल्लेख किया गया था।

ऐतिहासिक दस्तावेज बने महत्वपूर्ण आधार
मांदर के झारखंड से पुराने और विशिष्ट सांस्कृतिक संबंध को प्रमाणित करने के लिए आवेदन के साथ कई ऐतिहासिक दस्तावेज पेश किए गए। इनमें मानवशास्त्री सरत चंद्र राय की 1915 की कृति, तारकचंद्र दास की 1931 की कृति और मानवशास्त्री W. G. Archer की 1940 की पुस्तक ‘The Blue Grove’ में मांदर से संबंधित उल्लेख शामिल थे। इसके अलावा 1920 की पटना संग्रहालय की वार्षिक रिपोर्ट, 1956 की Folk Dances in India और बिहार जिला गजेटियर, रांची जैसे दस्तावेज भी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए।

W. G. Archer के दस्तावेजों का भी उल्लेख
W. G. Archer ने छोटानागपुर क्षेत्र में स्थानीय उरांव समुदाय की परंपराओं और लोकजीवन का अध्ययन किया था। उनकी 1940 में प्रकाशित पुस्तक में मांदर को स्थानीय पारंपरिक नृत्य और संगीत से जुड़े वाद्य के रूप में दर्ज किया गया था। आवेदन में उनके द्वारा संकलित स्थानीय लोककविता का भी उल्लेख किया गया, जिसमें मांदर के प्रति समुदाय के भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाया गया था।

GI प्रक्रिया में डॉ. सत्यदीप सिंह की भूमिका
Intellectual Property और Geographical Indications के विशेषज्ञ तथा NUSRL रांची के विजिटिंग फैकल्टी डॉ. सत्यदीप सिंह ने GI प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आवेदन दाखिल करने से लेकर GI Registry, चेन्नई के समक्ष मामले की पैरवी, दस्तावेज और अनुपालन प्रस्तुत करने तथा विभिन्न चरणों में मामले को रखने का कार्य किया। जनवरी 2025 में दिल्ली में हुई अंतिम सुनवाई में भी उन्होंने मामले की पैरवी की।
NUSRL और गुमला प्रशासन का भी सहयोग
इस प्रक्रिया में National University of Study and Research in Law (NUSRL), रांची की ओर से कानूनी और प्रक्रियात्मक अनुपालन में सहयोग दिया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अशोक पाटिल के मार्गदर्शन और सहयोग का भी उल्लेख किया गया है। वहीं, गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और जिला प्रशासन की ओर से आवश्यक प्रशासनिक एवं स्थानीय सहयोग दिए जाने की बात कही गई है। मुख्यमंत्री लघु कुटीर उद्यम विकास बोर्ड और गुमला के जिला समन्वयक सूरज कुमार के सहयोग का भी उल्लेख है।

पहले भी झारखंड की कला को GI पहचान दिलाने में भूमिका
डॉ. सत्यदीप सिंह इससे पहले झारखंड की सोहराय-खोवर चित्रकला को GI दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। इसके बाद कोडरमा के केसरिया कलाकंद को GI दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका रही है।

कारीगरों की विरासत को मिलेगी पहचान
GI दर्जा मिलने को झारखंड की लोकसंस्कृति, पारंपरिक ज्ञान, शिल्प कौशल और मांदर बनाने वाले कारीगरों की विरासत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। इससे पारंपरिक कारीगरों को पहचान देने और झारखंड की लोकपरंपरा को व्यापक स्तर पर सामने लाने में मदद मिल सकती है। रायडीह मंदार प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से जुड़े कारीगरों की सूची भी तैयार की गई है। इसके अलावा गुमला में मांदर गुणवत्ता/जांच परीक्षण भवन भी स्थापित किया गया है।

जनवरी 2025 में हुई थी अंतिम सुनवाई
जनवरी 2025 में मांदर कलाकारों के साथ GI मामले की अंतिम सुनवाई के लिए राज्य की टीम दिल्ली पहुंची थी। यह सुनवाई GI प्रक्रिया के महत्वपूर्ण चरणों में से एक रही।
झारखंड के लिए क्यों अहम है यह GI दर्जा?
मांदर को GI पहचान मिलने से झारखंड की पारंपरिक लोककला और इससे जुड़े कारीगरों की विशिष्ट पहचान को औपचारिक मान्यता मिली है। साथ ही, मांदर की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण कदम है।

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