जल-जंगल-जमीन हमारी विरासत है, सरकारें कर रही हैं उपेक्षा: विकास महतो.

झारखंड/बिहार विधानसभा चुनाव

🔴 हूल दिवस पर टंडवा के कारों गांव में वन अधिकार जागरूकता कार्यक्रम, ग्रामसभा की ताकत पर जोर


🔸 मुख्य बिंदु

  • टंडवा के कारों में ग्रामसभा और वन अधिकार समिति द्वारा हूल दिवस मनाया गया

  • मुख्य अतिथि विकास महतो ने संथाल विद्रोह के नायकों को श्रद्धांजलि दी

  • जल, जंगल और जमीन पर ग्रामसभा के स्वामित्व को लेकर वक्ताओं ने रखी मजबूत बात

  • वन अधिकार कानून के सही क्रियान्वयन की मांग, सरकारी उपेक्षा पर जताई चिंता

  • सैकड़ों ग्रामीणों की सहभागिता, अधिकार जागरूकता की हुई मजबूत अपील



संथाल विद्रोह के नायकों को किया गया नमन

टंडवा प्रखंड के कारों गांव में आयोजित हूल दिवस सह वन अधिकार जागरूकता कार्यक्रम में संथाल विद्रोह के नायकों — सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव, फूलो-झानो, चाणकू महतो, बैजल सोरेन और राजवीर सिंह — को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की गई। मुख्य अतिथि विकास महतो ने कहा कि इन महान योद्धाओं की क्रांति ने पूरे संथाल परगना और छोटानागपुर को आंदोलित कर दिया था।

ग्रामसभा के अधिकारों को लेकर उठी जोरदार आवाज

कार्यक्रम में वक्ताओं ने खासकर इस बात पर जोर दिया कि जल, जंगल और जमीन ग्रामसभा के अधीन हैं, लेकिन सरकारें इसे लागू करने में रुचि नहीं लेतीं। विकास महतो ने कहा:

“वन अधिकार कानून एक ऐतिहासिक और अतिमहत्वाकांक्षी कानून है, लेकिन इसे जानबूझकर निष्क्रिय बना दिया गया है। यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए तो 70% ग्रामीणों की आजीविका सुनिश्चित हो सकती है।”

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सरकार, अधिकारी और जनप्रतिनिधि बदलें मानसिकता: पुनीत मिंज

विशिष्ट अतिथि पुनीत मिंज ने सरकार और अफसरों की नीयत पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक उनके भीतर मानसिक बदलाव नहीं आता, तब तक वन अधिकार कानून की सही क्रियान्वयन की उम्मीद नहीं की जा सकती।

मालिकाना हक की भावना जरूरी: रोशन होरो

रोशन होरो ने कहा कि ग्रामीणों को अपने संसाधनों पर मालिकाना अधिकार की समझ विकसित करनी होगी। जब तक खुद को मालिक नहीं मानेंगे, तब तक अधिकार केवल कागजों में रह जाएंगे।

ग्रामीणों की बड़ी भागीदारी और संगठित अपील

कार्यक्रम में सैकड़ों ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं ने भाग लिया। कार्यक्रम को संबोधित करने वालों में थे:

  • कीचटो पंचायत की मुखिया संगीता देवी

  • चतरा जिला वन अधिकार समिति अध्यक्ष अशोक भारती

  • संतोष महतो, रीता बारला, रोशन होरो, पुनीत दा, सुमन दीदी, रूपलाल महतो, रामकुमार उरांव, अंगद महतो, अनिल महतो, दर्शन गंझू आदि।

सभी वक्ताओं ने कहा कि हूल विद्रोह केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज के वनाधिकार संघर्ष का प्रेरणा स्रोत है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि ग्रामसभाओं को गांव-गांव में सक्रिय करना, जागरूकता बढ़ाना और कानूनी हक की रक्षा करना अब समय की मांग है।

मौके पर उपस्थित प्रमुख ग्रामीण

प्रेम सुंदर लकड़ा, अनूप उरांव, सतेंद्र कुजूर, भोला उरांव, बुधन महतो, रामचंद्र महतो, शीलबानुश किस्पोट्टा, धनेश्वर उरांव, रूपु महतो, प्रियंका देवी, चिंता देवी, प्रभा कुजूर, वीणा देवी, गोविंद उरांव, माइनो देवी, मुनेश मुंडा, धनंजय महतो, मीना देवी, सुशील देवी सहित सैकड़ों ग्रामीण कार्यक्रम में मौजूद रहे।

हूल की ज्वाला अब वनाधिकार की चेतना में

इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि हूल क्रांति की ज्वाला आज भी वनाधिकार आंदोलन में जीवित है। यदि ग्रामसभा को मजबूत किया जाए, तो जल, जंगल, जमीन पर सामुदायिक हक़ को संरक्षित और लागू किया जा सकता है।

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