बंद कोयला खदानों की बदलेगी तस्वीर! झारखंड की 2 खदानें पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित
झारखंड में बंद होने वाली कोयला खदानों को फिर से उपयोगी बनाने की दिशा में बड़ी पहल शुरू हुई है। गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट और रामगढ़ की करमा ओसीपी को पायलट परियोजना के लिए चुना गया है।
प्रमुख बातें
- गिरिडीह ओसीपी और करमा ओसीपी पायलट प्रोजेक्ट के लिए चयनित।
- दोनों खदानों के लिए भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर सहमति।
- खदान बंद होने के बाद भूमि, जल और आधारभूत ढांचे के पुन: उपयोग की योजना।
- नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन, कृषि और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों की संभावनाएं तलाशी जाएंगी।
- करमा ओसीपी के आसपास के 8 गांवों का सामाजिक-आर्थिक आकलन किया जा रहा है।
- परियोजना के तहत विस्तृत फाइनल माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान तैयार होगा।
- टीसीसीएम परियोजना मार्च 2030 तक संचालित होगी।
बंद खदानों को फिर बनाया जाएगा उपयोगी
झारखंड सरकार ने बंद होने वाली कोयला खदानों के वैज्ञानिक पुनर्वास और दोबारा उपयोग की दिशा में यह पहल शुरू की है। इसके तहत गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट और रामगढ़ जिले की करमा ओसीपी को पायलट परियोजना के तौर पर चुना गया है।
रांची में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों खदानों के लिए भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर सहमति बनी। बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल समेत राज्य सरकार, जीआईजेड, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, सीसीएल और सीएमपीडीआई के अधिकारी मौजूद रहे।

खदान बंद होने के बाद भी होगा इस्तेमाल
इस परियोजना का उद्देश्य केवल खनन बंद करना नहीं, बल्कि खदानों की जमीन और उससे जुड़ी परिसंपत्तियों का भविष्य में उपयोग सुनिश्चित करना है।
योजना के तहत इन क्षेत्रों में संभावित रूप से:
- नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं
- पर्यटन और इको-टूरिज्म
- कृषि एवं बागवानी
- मत्स्य पालन
- कौशल विकास केंद्र
- स्थानीय आर्थिक गतिविधियां
विकसित की जा सकती हैं।

तैयार होगी विस्तृत योजना
चयनित दोनों खदानों के लिए विस्तृत डीपीआर और फाइनल माइन क्लोजर एंड रिपर्पजिंग प्लान तैयार किया जाएगा। इसमें पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, भूमि उपयोग, जल प्रबंधन, माइन वॉइड मैनेजमेंट और मौजूदा आधारभूत संरचना के पुन: उपयोग का अध्ययन शामिल होगा।
इसके अलावा उपयुक्त स्थानों पर नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य निवेश की संभावनाओं का भी आकलन किया जाएगा।
करमा ओसीपी के 8 गांवों पर विशेष फोकस
करमा ओसीपी के करीब 5 किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी गांवों को चिन्हित किया गया है।
इन गांवों में सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कमजोर वर्गों और आजीविका के नए अवसरों का आकलन किया जा रहा है। स्थानीय लोगों के साथ समन्वय के लिए माइन क्लोजर एडवाइजरी कमेटी का भी गठन किया गया है।
पर्यावरण सुधार के साथ रोजगार पर जोर
सरकार के अनुसार, खदान बंद होने के बाद प्रभावित क्षेत्रों को दोबारा उत्पादक बनाना इस पहल का अहम उद्देश्य है। इससे एक ओर पर्यावरणीय सुधार की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
इस मॉडल को सफल होने पर देश की दूसरी बंद होती कोयला खदानों में भी लागू किया जा सकता है।
मार्च 2030 तक चलेगी टीसीसीएम परियोजना
यह पहल भारत सरकार के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था जीआईजेड के सहयोग से संचालित टेक्निकल कोऑपरेशन ऑन टू-बी-क्लोज्ड कोल माइंस (टीसीसीएम) परियोजना के तहत हो रही है।
परियोजना मार्च 2030 तक संचालित होगी। इसके अनुभवों के आधार पर देश के अन्य खनन क्षेत्रों में भी बंद खदानों के सतत पुन: उपयोग का मॉडल विकसित करने की योजना है।
