आदिवासी अधिकारों पर हमला, पेसा लागू होने से रोकने की साज़िश का पर्दाफाश.

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पेसा कानून पर 15 साल पुराना षड्यंत्र उजागर, संगठन के पीछे ‘रहस्यमयी ताक़त’ का आरोप

जमशेदपुर में मांझी-परगना सम्मेलन, पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन रहे मुख्य अतिथि

मुख्य बिंदु:

  • पेसा कानून को रोकने के 15 साल पुराने षड्यंत्र की पोल खुली

  • आरोप: संगठन सिर्फ चेहरा, पीछे काम कर रही रहस्यमयी ताक़त

  • आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकार पर हमला बताई गई साज़िश

  • आर्थिक और अध्यात्मिक नियंत्रण की रणनीति का भी खुलासा

  • कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा विधायक चंपई सोरेन मौजूद


जमशेदपुर में आयोजित मांझी-परगना महल सम्मेलन में पेसा कानून से जुड़ा बड़ा खुलासा सामने आया। सम्मेलन में वक्ता निशा उरांव ने आरोप लगाया कि पेसा कानून (PESA Act) को लागू होने से रोकने के पीछे 15 साल पुराना षड्यंत्र है। उनके अनुसार, इस साज़िश का चेहरा एक संगठन है, लेकिन असली ताक़त इसके पीछे छिपी हुई ‘रहस्यमयी शक्ति’ है।

निशा उरांव ने कहा कि यह षड्यंत्र केवल आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों को बाधित करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य आदिवासियों पर “आध्यात्मिक और आर्थिक नियंत्रण” स्थापित करना भी है।

इस सम्मेलन में छह प्रखंडों से आए मांझी बाबा, पुरसी मांझी, दिशोम परगना और देश परगना ने भी हिस्सा लिया। सभी वक्ताओं ने पेसा कानून की अहमियत पर चर्चा की और इसे रोकने वाली ताक़तों का विरोध जताया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान भाजपा विधायक चंपई सोरेन थे। उन्होंने सभी वक्ताओं की बातें ध्यानपूर्वक सुनी और आदिवासी समाज की इस चिंता को गंभीर माना।

इसे पूर्व निदेशक, पंचायती राज विभाग, झारखंड सरकार की निशा उरांव ने सोशल मीडिया पर साझा की, जिसके बाद यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है।

अब सवाल उठ रहा है कि आखिर पेसा कानून को रोकने वाली वह रहस्यमयी ताक़त कौन है, और 15 साल से चल रहा यह षड्यंत्र किसके हितों की रक्षा के लिए रचा गया था।

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