झारखंड में कुडमी को एसटी दर्जा देने के खिलाफ आदिवासी संगठनों का विरोध तेज
12 अक्टूबर को मोरहाबादी मैदान में होगी आदिवासी महारैली
रांची। झारखंड में कुडमी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) सूची में शामिल करने की मांग के खिलाफ आदिवासी संगठनों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की ने सिरमटोली सरना स्थल पर आयोजित बैठक में चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार कुडमी समाज को एसटी का दर्जा देती है तो आदिवासी समाज के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा और उन्हें राज्य छोड़ने की स्थिति आ सकती है।

आदिवासी संस्कृति पर खतरे का आरोप
अजय तिर्की ने कहा कि कुडमी समाज की यह मांग आदिवासी समाज के हक और अधिकारों पर सीधा हमला है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति को मिटाने की साज़िश का हिस्सा है।
ऐतिहासिक तथ्य और विरोध की दलील
आदिवासी नेता ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि कुडमी समुदाय मूल रूप से आदिवासी नहीं है। ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि कुडमी 17वीं सदी में बिहार से झारखंड आए थे और 1872 से 1931 तक वे अलग वर्ग में दर्ज थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुडमी समाज आदिवासी स्वशासन और पेसा कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
5 अक्टूबर की रैली स्थगित, अब 12 अक्टूबर को शक्ति प्रदर्शन
केंद्रीय सरना समिति के नेता रूपचंद तिर्की ने बताया कि पर्व-त्योहारों के कारण 5 अक्टूबर को प्रस्तावित रैली स्थगित कर दी गई है। अब 12 अक्टूबर को रांची के मोरहाबादी मैदान में आदिवासी समाज अपनी ताकत का प्रदर्शन करेगा और संवैधानिक तथ्यों के आधार पर केंद्र सरकार को संदेश देगा।
कुडमी समाज से संवैधानिक दायरे में मांग रखने की अपील
आदिवासी नेता बाहा लिंडा ने कुडमी समाज से अपील की कि वे मर्यादित भाषा का प्रयोग करें और अपनी मांग को केवल संवैधानिक दायरे में रखकर ही आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई सीधे केंद्र सरकार से है और देश व राज्य को बचाने की जिम्मेदारी भी उसी की है।
बैठक में मौजूद नेता
बैठक में प्रकाश हंस, मुन्ना मिंज, सचिन कच्छप, निरज कुमार सोरेन, बबलु उरांव, सुरज टोप्पो, मुन्ना उरांव समेत कई आदिवासी नेता मौजूद रहे।
