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“किसके इशारे पर चयन?” सूचना आयोग विवाद ने पकड़ी आग

झारखंड/बिहार ताज़ा ख़बर विधानसभा चुनाव

सूचना आयोग: नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे गंभीर आरोप, राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग

मुख्य बिंदु

  • सूचना आयोग में नियुक्ति प्रक्रिया पर अनियमितताओं का आरोप
  • जनाधिकार महासभा ने राज्यपाल से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की
  • चयनित नामों में राजनीतिक जुड़ाव के आरोप
  • पारदर्शिता और संविधानिक मानकों के उल्लंघन का दावा

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मामला क्या है? नियुक्तियों पर बड़ा विवाद

झारखंड में सूचना आयोग में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है।झारखंड जनाधिकार महासभा ने राज्यपाल को पत्र लिखकर पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं और तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

RTI कानून की अनदेखी का आरोप

महासभा ने अपने पत्र में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है।
लेकिन झारखंड में मई 2020 से सूचना आयोग लगभग निष्क्रिय स्थिति में है, जिससे हजारों अपीलें लंबित हैं।

ऐसे में आयोग को मजबूत करने के बजाय नियुक्ति प्रक्रिया पर ही सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय बताया गया है।

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चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप

पत्र में दावा किया गया है कि चयन समिति द्वारा जिन 5 नामों की अनुशंसा की गई है, उनमें से कई व्यक्तियों का राजनीतिक दलों से सीधा या अप्रत्यक्ष संबंध है।

इतना ही नहीं, कुछ नाम ऐसे भी बताए गए हैं जिनकी पात्रता RTI अधिनियम की धारा 15 के अनुसार स्पष्ट नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन की अनदेखी?

महासभा ने यह भी आरोप लगाया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मानकों का पालन नहीं किया गया।

 आरोप है कि:

  • चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही
  • शॉर्टलिस्ट और चयन मानदंड सार्वजनिक नहीं किए गए
  • योग्य और स्वतंत्र व्यक्तियों को प्राथमिकता नहीं दी गई

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 राज्यपाल से क्या मांग की गई?

जनाधिकार महासभा ने राज्यपाल से कई अहम मांगें रखी हैं:

  • चयनित 5 नामों की अनुशंसा पर तत्काल रोक लगाई जाए
  • सभी रिक्त पदों पर पारदर्शी तरीके से नियुक्ति की जाए
  • पूरी चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए
  • केवल योग्य, निष्पक्ष और गैर-राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्ति हो
  • एक महीने के भीतर आयोग को पूर्ण रूप से सक्रिय किया जाए

क्यों अहम है यह मुद्दा?

सूचना आयोग किसी भी लोकतंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही का सबसे बड़ा माध्यम होता है।
अगर इसकी नियुक्तियों पर सवाल उठते हैं, तो सीधे तौर पर जनता के अधिकार प्रभावित होते हैं।

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निष्कर्ष: पारदर्शिता बनाम राजनीति

स्पष्ट है कि झारखंड में सूचना आयोग की नियुक्तियों को लेकर उठे ये सवाल आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकते हैं।

अब देखना यह होगा कि राज्यपाल इस मामले में क्या कदम उठाते हैं और क्या वास्तव में नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाती है या नहीं।

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