JTET भाषा विवाद में विभागों की ‘फेका-फेंकी’, कोई लेने को तैयार नहीं जिम्मेदारी
झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर जारी विवाद अब सिर्फ भाषा का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सरकारी विभागों की कार्यशैली और जवाबदेही पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कार्मिक विभाग, स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग और जैक बोर्ड एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर पांच मंत्रियों की हाई पावर कमेटी इस विवाद का समाधान कैसे निकालेगी, जब संबंधित विभाग ही स्पष्ट जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं।
प्रमुख बातें
- JTET भाषा विवाद में विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर टकराव
- कार्मिक विभाग ने मामला शिक्षा विभाग पर डाला
- शिक्षा विभाग ने जवाबदेही JAC बोर्ड की ओर बढ़ाई
- JAC ने कहा- हमारे पास भाषाई आंकड़े ही नहीं
- पांच मंत्रियों की कमेटी को अब तक नहीं मिले स्पष्ट जवाब
- छात्रों और अभ्यर्थियों में बढ़ रही असमंजस की स्थिति
विभागों के बीच जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
JTET में मगही, भोजपुरी और अंगिका जैसी भाषाओं को शामिल करने और फिर हटाने को लेकर जब विवाद बढ़ा, तब सरकार ने पांच मंत्रियों की हाई पावर कमेटी बनाई। उम्मीद थी कि कमेटी इस मामले का समाधान निकालेगी और विवाद की असली वजह सामने आएगी। लेकिन शुरुआती बैठकों से जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, हाई पावर कमेटी ने सबसे पहले कार्मिक विभाग से जानकारी मांगी। कार्मिक विभाग ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि JTET नियमावली स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से जुड़ी हुई है। इसके बाद मामला शिक्षा विभाग के पास पहुंचा।
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शिक्षा विभाग ने जिम्मेदारी JAC पर डाली
सूत्रों के अनुसार, शिक्षा विभाग ने भी इस पूरे विवाद की जिम्मेदारी सीधे तौर पर लेने के बजाय मामला झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) की ओर बढ़ा दिया। इसके बाद जब JAC से सवाल पूछे गए तो बोर्ड ने साफ कहा कि उसके पास यह आंकड़े ही उपलब्ध नहीं हैं कि राज्य में किस भाषा को बोलने वालों की संख्या कितनी है।
यहीं से विवाद और गहरा गया। सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब संबंधित विभागों और बोर्ड के पास आधारभूत आंकड़े तक मौजूद नहीं हैं, तो आखिर किन परिस्थितियों और किस आधार पर भाषाओं को जोड़ा और हटाया गया?
कमेटी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
हाई पावर कमेटी ने तीन अहम सवालों के जवाब मांगे हैं। पहला, वर्ष 2012 में मगही, भोजपुरी और अंगिका को शामिल करने का आधार क्या था। दूसरा, 2026 की नियमावली में इन्हें हटाने का कारण क्या है। तीसरा, राज्य में क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाएं बोलने वालों की वास्तविक संख्या कितनी है।
लेकिन अब तक किसी विभाग ने इन सवालों का स्पष्ट और ठोस जवाब नहीं दिया है। ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि जब विभागों के बीच ही “फेका-फेंकी” की स्थिति बनी हुई है, तब पांच मंत्रियों की कमेटी आखिर किसी ठोस नतीजे तक कैसे पहुंचेगी।
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छात्रों के भविष्य पर बढ़ी चिंता
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर JTET अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है। आवेदन प्रक्रिया जारी है, लेकिन भाषा को लेकर स्पष्टता नहीं होने से छात्र असमंजस में हैं। कई अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार और विभागों की आपसी उलझन का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय भाषा और पहचान से जुड़े संगठनों ने भी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि बिना स्पष्ट नीति और अध्ययन के भाषा संबंधी फैसले लेना भविष्य में और बड़े विवाद को जन्म दे सकता है।
22 मई की बैठक पर टिकी निगाहें
अब सभी की नजर 22 मई को होने वाली अगली बैठक पर है। माना जा रहा है कि इस बैठक में शिक्षा विभाग, कार्मिक विभाग और JAC से फिर विस्तृत जानकारी मांगी जाएगी। हालांकि अब तक की स्थिति को देखते हुए यह कहना मुश्किल है कि कमेटी को इस बार भी स्पष्ट जवाब मिल पाएंगे या नहीं।
