HEC बंद करने की सिफारिश पर विवाद तेज, केंद्र की औद्योगिक नीति पर उठे सवाल
रांची- देश की प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (HEC) को बंद करने की सिफारिश सामने आने के बाद औद्योगिक और श्रमिक संगठनों में गहरा असंतोष है। केंद्र सरकार द्वारा इस संबंध में मंत्रालय से रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गया है। विरोधी दलों और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह कदम रणनीतिक सार्वजनिक उद्यमों को कमजोर करने की दिशा में बढ़ाया गया बड़ा कदम है।
सात वर्षों के घाटे को आधार बनाकर बंदी की चर्चा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2018–19 से 2024–25 के बीच HEC लगातार वित्तीय संकट से जूझता रहा है। कंपनी को जिन वर्षों में घाटा दिखाया गया, वे इस प्रकार हैं—
33.67 करोड़, 405.37 करोड़, 175.78 करोड़, 256.07 करोड़, 230.85 करोड़, 275.19 करोड़ और 265.13 करोड़ रुपये।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि घाटे का यह दौर बाज़ार के हालात की वजह से नहीं, बल्कि पूंजी निवेश और नई परियोजनाओं की अनुपलब्धता के कारण उत्पन्न हुआ। उनका तर्क है कि HEC की मशीनरी, संयंत्र और तकनीकी संसाधनों के उन्नयन के लिए लंबे समय से आवश्यक पूंजी उपलब्ध नहीं कराई गई।
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बकाया भुगतान और नए आदेशों की कमी भी बड़ी वजह
संगठनों ने यह भी दावा किया है कि केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों से लगभग 4300 करोड़ रुपये की बकाया राशि लंबे समय से लंबित है, जो पूरी तरह चुकता हो जाती तो इकाई को आधुनिक बनाने और उसके संचालन को सुचारू रखने में बड़ी मदद मिल सकती थी।
इसके साथ ही HEC को नए कॉन्ट्रैक्ट्स और परियोजनाओं से दूर रखा गया, जबकि कंपनी का भारी मशीनरी, खनन, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में लंबे समय का अनुभव रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आदेशों की कमी ने वित्तीय स्थिति को और कमजोर किया।
संभावित बंदी को लेकर विरोध, कर्मचारी संगठनों ने उठाई मांगें
बंदी की सिफारिश के बाद कर्मचारी यूनियनों और विभिन्न औद्योगिक संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि ऐसी स्थिति में हजारों मजदूरों, इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों की आजीविका पर गंभीर खतरा पैदा होगा। संगठनों ने केंद्र सरकार से मांग की है कि—
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HEC बंद करने की किसी भी प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए
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रद्द बैंक गारंटी पुनः बहाल की जाए
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इकाई को नए आदेश, आधुनिकीकरण पैकेज और तकनीकी उन्नयन योजना दी जाए
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सार्वजनिक उद्योग नीति को पुनर्स्थापित कर PSU की भूमिका मजबूत की जाए
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किसी भी प्रकार की छँटनी या विनिवेश न किया जाए
औद्योगिक क्षमता पर असर को लेकर भी चिंता
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि HEC जैसी इकाइयाँ सिर्फ औद्योगिक उत्पादन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की रणनीतिक क्षमता—विशेषकर भारी इंजीनियरिंग, अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र—के लिए आधार तैयार करती हैं। ऐसे में इस तरह के संस्थानों का भविष्य असमंजस में रहने से राष्ट्रीय औद्योगिक ढांचे पर लंबी अवधि का प्रभाव पड़ सकता है।
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है, लेकिन HEC का भविष्य अगले कुछ दिनों में महत्वपूर्ण नीति निर्णयों पर निर्भर करेगा।
