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“ST दर्जा क्यों नहीं?” असम में आदिवासियों पर बड़ा सवाल!

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असम में आदिवासियों के साथ “ऐतिहासिक अन्याय”? हेमंत सोरेन का बड़ा आरोप

असम की राजनीति में एक ऐसा मुद्दा सामने आया है, जिसने न सिर्फ सियासी हलचल बढ़ा दी है, बल्कि पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने चाय बागान में रहने वाले आदिवासी समाज को लेकर बड़ा बयान दिया है।

“अब और नहीं चलेगा अन्याय” – चाय मजदूरों के समर्थन में हेमंत सोरेन

“ST दर्जा नहीं मिलना राष्ट्रीय अन्याय”

सबसे पहले, हेमंत सोरेन ने साफ शब्दों में कहा कि असम के चाय बागानों में पीढ़ियों से रह रहे आदिवासी समुदाय को अब तक अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा नहीं मिलना कोई सामान्य चूक नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय स्तर का अन्याय” है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा सिर्फ कागजी नहीं, बल्कि लाखों लोगों की पहचान और अधिकार से जुड़ा हुआ है।

इतिहास से जुड़ा दर्द: अंग्रेजों से लेकर आज तक

दरअसल, सोरेन ने इस मुद्दे की जड़ें इतिहास से जोड़ीं।
उन्होंने बताया कि अंग्रेजों के समय आदिवासियों को उनके घरों से दूर लाकर असम के चाय बागानों में बसाया गया।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि:

  • उन्होंने असम की अर्थव्यवस्था खड़ी की
  • पीढ़ियों से वहीं रह रहे हैं
  • फिर भी आज तक उन्हें संवैधानिक पहचान नहीं मिली

सरकारें बदलीं, लेकिन हालात नहीं

इसके बाद, सोरेन ने सरकारों पर भी सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस समुदाय की स्थिति जस की तस बनी रही।

 इतना ही नहीं:

  • बड़े-बड़े वादे किए गए
  • लेकिन मुद्दा प्राथमिकता नहीं बना
  • कई बार घोषणापत्र में भी जगह नहीं मिली

“यह राजनीति नहीं, अधिकार की लड़ाई है”

स्पष्ट रूप से, Hemant Soren ने कहा कि यह मुद्दा राजनीति से ऊपर है।

उनके अनुसार:

  • यह न्याय का सवाल है
  • यह सम्मान का सवाल है
  • यह पहचान का सवाल है

और इसलिए, अब और देरी नहीं होनी चाहिए।

बड़ी मांग: “अब और इंतजार नहीं”

आखिर में, उन्होंने मांग की कि असम के आदिवासी समाज को उनका पूरा संवैधानिक अधिकार तुरंत दिया जाए।

उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा—
“जब तक न्याय अधूरा है, तब तक लोकतंत्र भी अधूरा है।”

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