“वीर बुधु भगत को सम्मान चाहिए, न कि विवादित विरासत- बाबूलाल मरांडी।

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बाबूलाल मरांडी का झारखंड सरकार पर हमला: “विश्वविद्यालय का नाम बदलना दुर्भाग्यपूर्ण, दोनों महापुरुषों का अपमान”

मुख्य बिंदु:

  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय का नाम बदलने पर बाबूलाल मरांडी का विरोध

  • सरकार पर इतिहास और विरासत को कमजोर करने का आरोप

  • वीर बुधु भगत के सम्मान में नए विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग



रांची: झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार के उस फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें रांची स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय का नाम बदलकर वीर बुधु भगत विश्वविद्यालय करने की घोषणा की गई है। उन्होंने इस फैसले को “बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” करार देते हुए कहा कि यह न केवल एक गलत परंपरा की शुरुआत है, बल्कि दोनों ही महापुरुषों के योगदान का अपमान है।

मरांडी ने यह बयान अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर साझा किया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि यह निर्णय न डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के सम्मान में है और न ही वीर बुद्धू भगत जी की विरासत को उचित सम्मान देता है।



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“नया विश्वविद्यालय बनता, तभी होता सच्चा सम्मान”

बाबूलाल मरांडी ने कहा कि यदि सरकार सच में वीर बुद्धू भगत जी को श्रद्धांजलि देना चाहती थी, तो उनके नाम पर एक नया विश्वविद्यालय स्थापित किया जाना चाहिए था। उन्होंने लिखा, “एक महान विभूति के नाम को हटाकर दूसरे के नाम पर संस्थान का नाम बदल देना दोनों ही व्यक्तित्वों की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।”

उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के कदम राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित लगते हैं, और इसका मकसद जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाना है।

सरकार से की निर्णय वापस लेने की मांग

नेता प्रतिपक्ष ने राज्य सरकार से तत्काल इस निर्णय को वापस लेने की अपील की है और आग्रह किया है कि वीर बुद्धू भगत जी के नाम पर एक नए विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। उन्होंने कहा कि इससे युवाओं को शिक्षा के नए अवसर मिलेंगे और वीर बुद्धू भगत जी की स्मृति को सार्थक तरीके से संरक्षित किया जा सकेगा।

मरांडी ने अंत में कहा, “अगर सरकार सकारात्मक पहल करती है, तो हम उसका पूर्ण समर्थन करेंगे। लेकिन यह निर्णय गलत परंपरा की शुरुआत है और इसे रोका जाना चाहिए।”

राजनीतिक गलियारों में हलचल

बाबूलाल मरांडी के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर शैक्षणिक संस्थानों के राजनीतिकरण को लेकर बहस तेज हो गई है। विपक्ष जहां इसे जनभावनाओं के साथ खिलवाड़ बता रहा है, वहीं सरकार की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

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