नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसरों का विरोध: स्थानांतरण नहीं, पहले हो नियमितीकरण
रांची, 23 अप्रैल 2025 — झारखंड के राज्य अधीनस्थ विश्वविद्यालयों और अंगीभूत महाविद्यालयों में कार्यरत नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापकों ने एक बार फिर अपनी लंबित मांगों को लेकर आवाज बुलंद की है। मंगलवार को रांची में आयोजित विचार-विमर्श सत्र में न केवल स्थानांतरण आदेशों का विरोध किया गया, बल्कि यह मांग भी रखी गई कि जब तक इन शिक्षकों का नियमितीकरण नहीं होता, तब तक किसी भी प्रकार का स्थानांतरण अव्यावहारिक और अन्यायपूर्ण है।

स्थानांतरण आदेशों पर तीखी प्रतिक्रिया
दिनांक 19 अप्रैल 2025 को पत्रांक RUR 7724/25 के तहत जारी कुछ नीड बेस्ड असिस्टेंट प्रोफेसरों के स्थानांतरण आदेशों का इस सत्र में कड़ा विरोध किया गया। शिक्षकों का कहना है कि सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहा है। वर्षों की सेवा के बावजूद उनके वेतन, स्थायित्व और सुविधाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है।
सात वर्षों से सेवा में, फिर भी वेतन और सुविधा से वंचित
नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति झारखंड सरकार के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के संकल्प संख्या 04/वि-135-516/2016 (दिनांक: 02.03.2017) और संकल्प संख्या 1040 (दिनांक: 11.05.2023) के आधार पर हुई थी। वर्ष 2017-18 से वे राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों के स्नातकोत्तर विभागों और महाविद्यालयों में कार्यरत हैं। बावजूद इसके, उन्हें न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही कोई अन्य लाभ।
वेतन में अनिश्चितता और कटौतियों की मार
प्राध्यापकों के अनुसार, उन्हें यूजीसी बेसिक पे के समतुल्य अधिकतम ₹57,700/- मानदेय मिलता है, वह भी कुछ शर्तों के साथ। जैसे ही कक्षाएं अवकाश या परीक्षा के कारण कम होती हैं, प्रति कक्षा ₹900/- की कटौती की जाती है। इतना ही नहीं, तीन-चार माह में एक बार भुगतान होता है और उसमें भी कटौती की जाती है। यह स्थिति शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षकों की गरिमा दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
स्थायी नियुक्ति से पहले स्थानांतरण क्यों?
नीड बेस्ड प्राध्यापकों का कहना है कि उनकी सेवा का कोई निश्चित आधार नहीं है। जब उन्हें नियमित मान्यता नहीं मिली है, जब वे मातृत्व अवकाश, चिकित्सा भत्ता, सेवा सुरक्षा से वंचित हैं, तब स्थानांतरण आदेश तर्कसंगत नहीं हो सकता। उनका कहना है कि रांची विश्वविद्यालय प्रशासन स्थानांतरण कर अपने कर्तव्यों से पल्ला झाड़ना चाहता है, जबकि उनकी सात वर्षों की सेवा को अब स्थायित्व मिलना चाहिए।
बहुआयामी भूमिका निभा रहे हैं नीड बेस्ड प्राध्यापक
इन प्राध्यापकों ने सिर्फ शिक्षण कार्य तक खुद को सीमित नहीं रखा है। वे वीक्षण, मूल्यांकन, प्रश्न-पत्र निर्माण, परीक्षा संचालन, विभागीय दायित्व, नैक मूल्यांकन, चुनाव कार्य जैसे तमाम प्रशासनिक जिम्मेदारियों का भी सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो स्थायित्व प्राप्त है और न ही गरिमामय वेतन।
सरकार से स्पष्ट और ठोस पहल की मांग
सभी नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक एक स्वर में कह रहे हैं कि सरकार पहले उनके नियमितीकरण की प्रक्रिया शुरू करे। जब तक स्थायित्व और वेतन सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक स्थानांतरण जैसे फैसले न केवल अव्यवहारिक हैं, बल्कि अमानवीय भी हैं। उन्हें न केवल कार्य की मान्यता चाहिए, बल्कि स्थायी सेवा के अधिकार भी।
कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी
प्राध्यापकों ने यह भी कहा कि एक कल्याणकारी राज्य की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज के सबसे शिक्षित वर्ग की सेवा को सुरक्षित और स्थायी बनाए। जो शिक्षक वर्षों से बिना स्थायित्व, बिना भत्ते और वेतन कटौतियों के बावजूद राज्य की नई पीढ़ी को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा दे रहे हैं, उन्हें गरिमामय सेवानिवृत्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
सरकार करे ठोस निर्णय
झारखंड के नीड बेस्ड सहायक प्राध्यापक इस वक्त एक संवेदनशील और संघर्षशील दौर से गुजर रहे हैं। उन्हें न सिर्फ अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है, बल्कि स्थानांतरण जैसी नीतियों से अपनी स्थिरता की लड़ाई भी लड़नी पड़ रही है। सरकार को इस विषय में शीघ्र और ठोस निर्णय लेते हुए पहले नियमितीकरण और फिर स्थानांतरण प्रक्रिया की ओर बढ़ना चाहिए।
