2019 से पहले स्थापित स्कूलों को RTE आवेदन से छूट मिले: पासवा अध्यक्ष
रांची। पब्लिक स्कूल्स एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर एसोसिएशन (पासवा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार दूबे ने झारखंड सरकार और शिक्षा विभाग पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि 2019 से पहले स्थापित निजी और सरकारी दोनों प्रकार के विद्यालयों को आरटीई (Right to Education) मान्यता हेतु पुनः आवेदन करने के लिए कहना माननीय उच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना होगी।
न्यायालय के आदेश का हवाला
दूबे ने बताया कि उच्च न्यायालय के आदेश (पॉइंट नंबर 51, पेज 17-18) में स्वयं सरकार ने अपने शपथ पत्र में यह स्वीकार किया है कि 2019 से पूर्व स्थापित विद्यालयों पर आरटीई के 25वें संवैधानिक संशोधन का प्रावधान लागू नहीं होगा। सरकार ने यह भी माना है कि यह नियम निजी और सरकारी दोनों तरह के विद्यालयों पर समान रूप से लागू होता है।
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निजी स्कूलों को क्यों बाध्य किया जा रहा है?
पासवा अध्यक्ष ने सवाल उठाया कि जब 1920, 1953 या उससे पहले स्थापित सरकारी विद्यालयों को इस नियम से छूट दी गई है, तो निजी विद्यालयों को क्यों बाध्य किया जा रहा है? उन्होंने कहा कि 2019 से पहले स्थापित निजी विद्यालय पहले ही मान्यता प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें जैक (JAC) कोड भी दिया गया है और सरकार के आदेश से वे आठवीं बोर्ड परीक्षा आयोजित कर रहे हैं। ऐसे में पुनः आवेदन का कोई औचित्य नहीं है।
पासवा की चेतावनी
दूबे ने साफ चेतावनी दी कि यदि सरकार अपने ही शपथ पत्र से पीछे हटती है और 2019 से पहले स्थापित विद्यालयों को मान्यता हेतु दोबारा आवेदन करने के लिए बाध्य करती है, तो पासवा उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर करने को बाध्य होगा।
मुख्यमंत्री से अपील
पासवा अध्यक्ष ने कहा कि झारखंड सरकार एक जनकल्याणकारी सरकार है और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जन-जन के नेता हैं। उन्हें विश्वास है कि मुख्यमंत्री इस मामले में संज्ञान लेंगे और 2019 से पहले स्थापित निजी विद्यालयों को राहत प्रदान करेंगे।
शिक्षा विभाग को सुझाव
अंत में दूबे ने शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों से अपील की कि वे मुख्यमंत्री के समक्ष न्यायालय के आदेश और सरकार के शपथ पत्र की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करें। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से झारखंड की शिक्षा व्यवस्था में भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी और निजी विद्यालयों को अनावश्यक परेशानियों से बचाया जा सकेगा।
