केवीके की सफलताओं की गूंज दिल्ली तक पहुंचाने की जरूरत: डॉ. राजवीर सिंह
रांची। भारत का कृषि विस्तार तंत्र दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है, जिसके बल पर भारत आज चावल उत्पादन में चीन को पछाड़कर शीर्ष पर पहुंच चुका है। देशभर में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा जिला स्तर पर कुल 731 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) संचालित किए जा रहे हैं। यह जानकारी आईसीएआर, नई दिल्ली के उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार) डॉ. राजवीर सिंह ने दी।

2014 से 2025 तक केवीके नेटवर्क का बड़ा विस्तार
डॉ. राजवीर सिंह ने बताया कि वर्ष 2014 में प्रति केवीके केवल 42 गांव जुड़े थे, जबकि 2025 तक यह संख्या बढ़कर 110 गांव हो चुकी है। वर्ष 2030 तक प्रति केवीके 200 गांवों के किसानों को जोड़ने का लक्ष्य तय किया गया है। उन्होंने कहा कि वास्तविक अर्थों में श्रेष्ठ और अनुभवी किसान ही कृषि के सच्चे अध्यापक और विशेषज्ञ होते हैं, इसलिए केवीके को ऐसे किसानों के पारंपरिक ज्ञान, नवाचार और खेत-स्तरीय शोध को संकलित कर जिला कृषि विस्तार कार्यक्रमों में शामिल करना चाहिए।

‘धन-धान्य योजना’ से विकसित भारत के लक्ष्य को मिलेगी मजबूती
मुख्य अतिथि ने जानकारी दी कि जल्द ही उत्कृष्ट किसानों के साथ जिला और राज्य स्तर के सभी कृषि हितधारकों को एक मंच पर लाकर ‘धन-धान्य योजना’ की शुरुआत की जाएगी। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र को और मजबूत बनाते हुए विकसित भारत के सपने को साकार करना है।

बिहार-झारखंड के केवीके का प्रदर्शन सराहनीय
डॉ. सिंह ने कहा कि पिछले दस वर्षों में देश के सभी 731 केवीके ने कृषि विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया है। खासकर बिहार और झारखंड में कार्यरत 68 केवीके का प्रदर्शन सराहनीय रहा है। इन केंद्रों द्वारा स्थापित सफलता की कहानियां प्रेरणादायी हैं और इन उपलब्धियों की गूंज नई दिल्ली तक पहुंचनी चाहिए, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर कृषि विकास को और बल मिल सके।
कृषि उत्पादन में राज्यों की उल्लेखनीय प्रगति
उन्होंने बताया कि केवीके कार्यक्रमों के माध्यम से बिहार और झारखंड के कृषि परिदृश्य में व्यापक सुधार आया है। बिहार आज मक्का उत्पादन में देश में अग्रणी है। राज्य में मखाना की खेती पिछले दस वर्षों में 12 हजार हेक्टेयर से बढ़कर 40 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है, जबकि मशरूम उत्पादन में बिहार दूसरे स्थान पर है। वहीं झारखंड सब्जी उत्पादन में अव्वल है और राज्य में दलहनी व तेलहनी फसलों का रकबा तेजी से बढ़ा है। धान कटाई के बाद दलहनी और तेलहनी फसलों की खेती तकनीक को और विस्तार देने की जरूरत बताई गई।
कार्यशाला में प्रकाशनों का विमोचन और सम्मान
यह बातें कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), पटना द्वारा राष्ट्रीय कृषि उच्चतर प्रसंस्करण संस्थान, नामकुम में आयोजित 8वीं वार्षिक क्षेत्रीय समीक्षात्मक कार्यशाला में कही गईं। उद्घाटन सत्र के दौरान दर्जनों प्रकाशनों का विमोचन किया गया और केवीके में उत्कृष्ट योगदान के लिए पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक-सह-प्रधान डॉ. संजय पांडे को सम्मानित किया गया।
विशेषज्ञों ने बताए कृषि विकास के नए रास्ते
विशिष्ट अतिथि बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एस.सी. दुबे ने सीमित संसाधनों में केवीके के उत्कृष्ट कार्यों की सराहना की और मॉडल विलेज, आईएफएस मॉडल तथा राइस-फैलो लैंड तकनीक को बढ़ावा देने पर जोर दिया। वहीं बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने प्रगतिशील किसानों को आधुनिक तकनीक के साथ उनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को सशक्त बनाने की आवश्यकता बताई।
प्राकृतिक खेती और उद्योगों के समावेशन पर जोर
आरके मिशन के सचिव स्वामी भबेशानंद ने केवीके, रांची की प्राकृतिक खेती में सफलता को रेखांकित किया। धानुका समूह के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. पी.के. चक्रवर्ती ने आईसीएआर, केवीके और कृषि संस्थानों के साथ एग्रो-इंडस्ट्री के समावेशन को भारत के कृषि भविष्य के लिए अहम बताया।
कार्यशाला में बड़ी संख्या में वैज्ञानिक और अधिकारी शामिल
इस अवसर पर बीसीकेवी, नदिया के पूर्व कुलपति डॉ. एम.एम. अधिकारी, नीसा, नामकुम के निदेशक डॉ. अभिजीत कार, अटारी निदेशक डॉ. अंजनी कुमार, समेत बिहार और झारखंड के सभी 68 केवीके के वरिष्ठ वैज्ञानिक-सह-प्रधान उपस्थित रहे। तीन दिवसीय कार्यशाला के संचालन में डॉ. अंजेश कुमार और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. मोनोबुल्लाह ने किया।
