झारखंड से चार बड़ी टेक्सटाइल कंपनियों का ओडिशा शिफ्ट होना बड़ा झटका, बाबूलाल मरांडी ने उठाए सवाल
रांची, 3 नवंबर 2025- झारखंड के औद्योगिक परिदृश्य के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। राज्य की चार प्रमुख टेक्सटाइल कंपनियाँ अब अपना उत्पादन केंद्र झारखंड से ओडिशा स्थानांतरित करने की तैयारी में हैं। उद्योग जगत का कहना है कि झारखंड की टेक्सटाइल नीति कागज़ों तक सीमित रह गई है, जबकि ओडिशा में सरकार से संवाद, सहयोग और सुविधाएँ बेहतर मिल रही हैं।
उद्योगपतियों की नाराजगी – “झारखंड में नीति है, लेकिन सुविधा नहीं”
आरोप है कि झारखंड में न तो आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हैं और न ही उद्योगों को नीतिगत समर्थन मिल पा रहा है। इसके विपरीत, ओडिशा सरकार उद्योगों को सक्रिय सहयोग और निवेश के अनुकूल माहौल दे रही है। परिणामस्वरूप कई कंपनियाँ अब वहां अपना उत्पादन केंद्र स्थानांतरित करने में जुटी हैं।
Ghatsila- मुसाबनी में आज हेमंत सोरेन की सभा। BJP ने भी झोंकी ताकत।
उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, बिजली, भूमि और लॉजिस्टिक सपोर्ट जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की कमी के कारण निवेशक झारखंड छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इससे न केवल औद्योगिक गतिविधियाँ प्रभावित हो रही हैं, बल्कि स्थानीय रोजगार पर भी बड़ा असर पड़ेगा।
बाबूलाल मरांडी ने सरकार पर साधा निशाना
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने यूरोप दौरे पर निवेश लाने की बात कही थी, लेकिन उसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
मरांडी ने कहा —
“मुख्यमंत्री के विदेश दौरे पर जनता के करोड़ों रुपये खर्च हुए, लेकिन उद्योग लाने के बजाय जो मौजूद थे, वे भी राज्य छोड़ रहे हैं। यह सरकार की नाकामी का स्पष्ट उदाहरण है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड में अपराध, भय और असुरक्षा के माहौल ने निवेशकों का विश्वास तोड़ दिया है। यही वजह है कि उद्योगपति अपने कारोबार दूसरे राज्यों में ले जाने को विवश हैं।
बेरोजगारी और पलायन की चिंता बढ़ी
चार बड़ी टेक्सटाइल कंपनियों के शिफ्ट होने से राज्य में रोजगार की संभावनाओं को बड़ा झटका लगेगा। पहले से ही बेरोजगारी और पलायन की मार झेल रहे युवा वर्ग पर इसका सीधा असर पड़ेगा। राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल उठ रहा है कि जब पड़ोसी राज्य निवेश आकर्षित कर रहे हैं, तो झारखंड पीछे क्यों रह गया?
विपक्ष का हमला, सरकार पर जवाबदेही का दबाव
इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष ने राज्य सरकार पर औद्योगिक नीति को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि हेमंत सोरेन सरकार की नीतियाँ कागज़ी दावों और विदेशी दौरों तक सीमित हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर उद्योगों के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं दिखती।
राज्य में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या झारखंड अपनी औद्योगिक पहचान बनाए रख पाएगा या निवेशकों का पलायन आने वाले दिनों में और तेज होगा।
