झारखंड में पराली संकट की दस्तक: हरियाली पर मंडरा रहा नया खतरा
मुख्य बिंदु-
– झारखंड में पराली जलाने की शुरुआती घटनाएँ बढ़ने लगीं
– हार्वेस्टर मशीनों से कटाई के बाद पराली निपटान में दिक्कत
– पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और हवा ज़हरीली होती है
– आने वाले वर्षों में रांची-जमशेदपुर में भी दिल्ली जैसी धुंध का खतरा
– वैज्ञानिक विकल्प और सरकारी हस्तक्षेप की अब सख्त जरूरत
पराली जलाने का खतरा: झारखंड की हरियाली के सामने नई चुनौती
रांची- झारखंड, जो अब तक प्रदूषण के असर से काफी हद तक सुरक्षित माना जाता था, अब पराली जलाने जैसी समस्या की ओर बढ़ रहा है। धान कटाई के बाद खेतों में छोड़ी गई पराली धीरे-धीरे आग की भेंट चढ़ने लगी है। राज्य के कई हिस्सों में यह दृश्य पंजाब और हरियाणा की तरह दोहराया जाने लगा है, जहाँ हर साल धुएँ की मोटी चादर आसमान को ढक लेती है और सांस लेना भी कठिन हो जाता है।
हार्वेस्टर मशीनों से बढ़ी समस्या, पराली निपटान में नई दिक्कत
इस वर्ष कई जिलों में हार्वेस्टर मशीनों से धान की कटाई और मिंसाई बढ़ गई है। मशीन से कटाई भले ही किसानों के लिए तेज और सस्ता विकल्प है, लेकिन पीछे बची पराली भारी मात्रा में खेतों में रह जाती है। किसान इसे हटाने में असमर्थ हो जाते हैं और इसका सबसे आसान रास्ता — आग लगाना — चुन लेते हैं। इससे खेत पर तो असर पड़ता ही है, बल्कि वायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ जाता है।
पराली जलाने के दुष्प्रभाव: उर्वरता घटती है, जहरीली गैसें बढ़ती हैं
कई किसानों की यह धारणा है कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, लेकिन वैज्ञानिक तथ्य पूरी तरह उलट हैं। पराली जलाने से मिट्टी में महत्वपूर्ण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, लाभकारी जीवाणु मर जाते हैं और भूमि की गुणवत्ता गिरती है।
इसके साथ ही पराली जलाने से निकलने वाला धुआँ पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे कणों के रूप में हवा में घुलकर फेफड़ों तक पहुँच जाता है। कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी गैसें हवा को जहरीला बनाती हैं, जिसका खामियाजा सबसे ज्यादा बच्चे, बुजुर्ग और दमा के मरीज भुगतते हैं।
क्या झारखंड भी पहुंचेगा स्मॉग की चपेट में?
अगर पराली जलाने की घटनाएँ अनियंत्रित रहीं, तो अगले 4–5 वर्षों में रांची, जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद जैसे शहर भी दिल्ली की तरह घने स्मॉग की चपेट में आ सकते हैं। दृश्यता कम होगी, सड़क हादसे बढ़ेंगे और अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या में तेज वृद्धि देखी जा सकती है।
फिलहाल यह समस्या ग्रामीण इलाकों तक सीमित है, परंतु यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई तो इसके व्यापक दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं।
समाधान की राह: जागरूकता और तकनीक की जरूरत
स्थिति को काबू में रखने के लिए किसानों को जागरूक करना बेहद जरूरी है कि पराली जलाना समाधान नहीं, बल्कि एक बड़ा पर्यावरणीय संकट है। सरकार को चाहिए कि बायो-डिकम्पोज़र, पराली प्रबंधन मशीनें, स्ट्रॉ रीपर और सब्सिडी आधारित योजनाओं को तेज़ी से गाँव-गाँव तक पहुँचाया जाए।
आने वाले समय में पराली का सही प्रबंधन ही झारखंड को बढ़ते प्रदूषण से बचा सकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों को इसी हरी-भरी धरती पर बेहतर हवा मिल सके।
