मुख्य बिंदु
• हिंडाल्को को वनारोपण के नाम पर दो कैबिनेट बैठकों में 830+ एकड़ भूमि आवंटन पर सवाल
• पलामू में खनन से पर्यावरण नुकसान, भरपाई कोल्हान जैसे आदिवासी शेड्यूल एरिया में क्यों?
• ग्राम सभा की अनुमति के बिना जमीन देने का आरोप
• सारंडा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी पर आदिवासियों के विस्थापन की आशंका
• पेसा अधिनियम पास, लेकिन ड्राफ्ट गायब—पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न
वन भूमि, आदिवासी अधिकार और पेसा पर सरकार के फैसलों पर चंपाई सोरेन का हमला
रांची- झारखंड में वन भूमि, खनन और आदिवासी अधिकारों को लेकर राज्य सरकार के फैसलों पर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री Champai Soren ने सरकार के हालिया कैबिनेट निर्णयों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे आदिवासी समाज के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बताया है।
हिंडाल्को को भूमि आवंटन पर उठे सवाल
दरअसल, 24 सितंबर को हुई कैबिनेट बैठक में राज्य सरकार ने Hindalco Industries Limited को पश्चिम सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड अंतर्गत उदाजो क्षेत्र में 271.92 एकड़ भूमि वनारोपण के लिए स्थायी रूप से देने का फैसला लिया। इसके बाद 23 दिसंबर को हुई कैबिनेट बैठक में 559 एकड़ अतिरिक्त गैर-वन भूमि भी हिंडाल्को को आवंटित कर दी गई।
सरकार का तर्क है कि यह भूमि पलामू प्रमंडल के चकला कोल ब्लॉक में इस्तेमाल की गई वन भूमि की भरपाई के रूप में दी गई है। हालांकि, इसी बिंदु पर चंपाई सोरेन ने सवाल खड़ा किया है।
“भरपाई पलामू में क्यों नहीं?”
चंपाई सोरेन ने कहा कि यदि कोयला खनन से पर्यावरणीय क्षति Palamu प्रमंडल में हुई है, तो उसकी भरपाई वहीं क्यों नहीं की जा रही। उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बजाय सरकार ने राज्य के दूसरे कोने में स्थित शेड्यूल एरिया, यानी आदिवासी बहुल कोल्हान क्षेत्र की जमीन कंपनी को दे दी।
उनका कहना है कि वनारोपण का विरोध नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि क्या आदिवासी इलाकों को ही हर बार “समायोजन की जमीन” समझ लिया गया है।
आजीविका पर खतरा, ग्राम सभा की अनदेखी
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जिस जमीन पर कंपनी वन लगाने की तैयारी कर रही है, वहां स्थानीय ग्रामीण वर्षों से खेती करते हैं और मवेशी चराते हैं। ऐसे में जमीन छीने जाने से उनकी आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने पूछा कि इसकी भरपाई कौन करेगा और सबसे अहम सवाल यह है कि जब ग्राम सभा से अनुमति नहीं ली गई, तो यह निर्णय कैसे लिया गया।
सारंडा वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी पर चिंता
इसी क्रम में Saranda में वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी बनाने के फैसले पर भी सवाल उठाए गए। चंपाई सोरेन ने कहा कि वन्य जीवों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन वहां रहने वाले आदिवासियों के भविष्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उन्होंने बताया कि सारंडा वन क्षेत्र में 50 राजस्व गांव और 10 वन गांव हैं, जहां करीब 75 हजार से अधिक लोग रहते हैं। इसी जंगल में सरना स्थल, देशाउली, ससनदिरी और मसना जैसे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थल मौजूद हैं, जो आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व से जुड़े हैं। इसके अलावा लघु वनोपज और जड़ी-बूटियां ही उनकी आजीविका का मुख्य आधार हैं।
खनन बचाने में तत्पर, आदिवासियों पर चुप्पी का आरोप
चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार खदानों को बचाने के लिए तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाती है, लेकिन उसी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों के अधिकारों पर एक शब्द भी नहीं कहती। उन्होंने सवाल किया कि यह कैसी “अबुआ सरकार” है।
पश्चिम सिंहभूम में दमन का आरोप
उन्होंने पश्चिम सिंहभूम जिले में आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में हस्तक्षेप, “नो एंट्री” की मांग कर रहे ग्रामीणों पर लाठीचार्ज और जबरन जेल भेजे जाने के मामलों का भी जिक्र किया और कहा कि ऐसे अत्याचार बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।
झारखंड बलिदानियों की धरती, पूर्वजों के संघर्ष का परिणाम है पेसा कानून: मुख्यमंत्री
पेसा अधिनियम पर सबसे बड़ा सवाल
पूर्व मुख्यमंत्री ने पेसा अधिनियम को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि झारखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जहां कैबिनेट से पेसा अधिनियम पास होने के बाद भी उसका ड्राफ्ट न तो जनप्रतिनिधियों को मिला और न ही मीडिया को।
अखबारों में विभागीय सचिव के उस बयान का हवाला देते हुए, जिसमें कहा गया था कि पेसा का त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ेगा, चंपाई सोरेन ने पूछा कि फिर यह कैसा पेसा अधिनियम है। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं यह कानून सिर्फ हाई कोर्ट को दिखाने के लिए तो पास नहीं किया गया।
कोल्हान से फिर उलगुलान की चेतावनी
बयान के अंत में चंपाई सोरेन ने कहा कि शहरों में आदिवासी धर्मांतरण से परेशान हैं, गांवों में घुसपैठ का डर है और जंगलों में सरकार उन्हें उजाड़ने पर तुली है। ऐसे में आदिवासी समाज के पास अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।
यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब झारखंड में वन, खनन और आदिवासी अधिकारों को लेकर पहले से ही माहौल गरम है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासत और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।
