मधुबन में ‘आस्था पर ताला’ विवाद! मांझीथान बंद मिलने पर बाबूलाल मरांडी भड़के, सरकार से मांगा जवाब
प्रमुख बातें
- मधुबन में मरांग बुरु दिसम मांझीथान का गेट बंद मिलने पर विवाद
- नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार और प्रशासन पर उठाए सवाल
- मांझीथान की चाभी प्रशासन के पास होने का दावा
- संताल समाज की आस्था और परंपरा से जुड़ा मामला गरमाया
- बाबूलाल ने आंदोलन की चेतावनी दी
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मधुबन से उठा बड़ा विवाद
झारखंड की राजनीति में एक बार फिर आदिवासी आस्था और धार्मिक अधिकारों का मुद्दा गरमा गया है। नेता प्रतिपक्ष Babulal Marandi ने मधुबन प्रवास के दौरान मरांग बुरु दिसम मांझीथान का गेट बंद मिलने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने इसे संताल समाज की आस्था और परंपराओं पर प्रशासनिक हस्तक्षेप करार दिया।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि जब वह पूजा-अर्चना के लिए मांझीथान पहुंचे तो वहां ताला लगा मिला। स्थानीय लोगों ने उन्हें बताया कि उसकी चाभी प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) के पास रखी गई है। इस घटना के बाद उन्होंने सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए।
“आस्था पर प्रशासनिक कब्जा स्वीकार नहीं”
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि मांझीथान कोई सरकारी भवन नहीं, बल्कि संताल समाज की आस्था, संस्कृति और पहचान का केंद्र है। ऐसे धार्मिक स्थल पर ताला लगाना और उसकी चाभी प्रशासन के पास रखना आदिवासी समाज का अपमान है।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर किस अधिकार से प्रशासन आदिवासी धार्मिक स्थल की निगरानी कर सकता है। मरांडी ने इसे आदिवासी धार्मिक अधिकारों में सीधा हस्तक्षेप बताया।
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Hemant Soren सरकार से मांगा जवाब
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री Hemant Soren से इस पूरे मामले पर जवाब मांगा है। उन्होंने कहा कि अगर आदिवासी समाज के धार्मिक स्थलों पर भी प्रशासन कब्जा जमाने लगेगा, तो फिर आदिवासी परंपराओं और अधिकारों की रक्षा कौन करेगा।
उन्होंने सरकार से मांग की कि मरांग बुरु दिसम मांझीथान में नियमित पूजा-अर्चना, उचित रखरखाव और परंपरा के अनुसार नायके की नियुक्ति तुरंत सुनिश्चित की जाए।
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आंदोलन की चेतावनी
बाबूलाल मरांडी ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर स्थिति नहीं बदली गई तो अगली बार मधुबन आने पर वह स्वयं संताल समाज के लोगों को संगठित कर मांझीथान का ताला खुलवाएंगे। साथ ही समाज की सहभागिता से नायके की नियुक्ति और आर्थिक सहयोग की स्थायी व्यवस्था भी सुनिश्चित करेंगे।
उन्होंने कहा कि संताल समाज अपनी आस्था, संस्कृति और आराध्य के सम्मान के लिए हर संघर्ष करने को तैयार है।
आदिवासी राजनीति में बढ़ सकता है असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मामला आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। आदिवासी आस्था और धार्मिक अधिकारों से जुड़े मामलों को लेकर पहले भी राज्य में कई बार राजनीतिक बयानबाजी और विरोध देखने को मिला है।
अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार और प्रशासन इस विवाद पर क्या सफाई देते हैं।
