Ghatshila by-election

सोमेश सोरेन के समर्थन में मां, बाबूलाल सोरेन के लिए मैदान में पिता चंपाई सोरेन.

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घाटशिला उपचुनाव में भावनाओं का संग्राम: एक तरफ मां का संकल्प, दूसरी तरफ पिता का नेतृत्व

मुख्य बिंदु:

  • घाटशिला में उपचुनाव अब भावनाओं बनाम नेतृत्व की लड़ाई में तब्दील

  • दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन की पत्नी अपने बेटे के लिए मैदान में

  • पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन बेटे बाबूलाल के लिए जुटे प्रचार में

  • सोशल मीडिया पर वायरल हुआ भावनात्मक संदेश

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रांची/घाटशिला। घाटशिला विधानसभा उपचुनाव का माहौल अब पूरी तरह भावनात्मक रंग ले चुका है। एक ओर दिवंगत मंत्री स्वर्गीय रामदास सोरेन की पत्नी अपने बेटे सोमेश सोरेन के लिए जनता से समर्थन की अपील कर रही हैं, तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन अपने बेटे बाबूलाल सोरेन के लिए मैदान में डटे हैं। यानी घाटशिला की धरती इस बार मां और पिता — दोनों के संकल्प का साक्षी बन रही है।

पत्नी का संदेश: “यह चुनाव नहीं, एक बलिदान का सम्मान है”
घाटशिला में सोशल मीडिया पर इन दिनों एक भावनात्मक संदेश तेजी से वायरल हो रहा है। इस संदेश में लिखा गया है —

“यह वोट नहीं, यह एक पत्नी के बलिदान और एक माँ के आँसुओं का सम्मान है। याद कीजिए, पूर्व मंत्री स्वर्गीय रामदास सोरेन ने घाटशिला के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी पत्नी ने अपने पति को जीवन देने के लिए अपनी एक किडनी दे दी। आज वही त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति अपने बेटे को लेकर जनता के बीच खड़ी हैं। उनका सपना है कि बेटा अपने पिता के अधूरे कार्यों को पूरा करे।”

यह भावनात्मक अपील सोमेश सोरेन के परिवार के विक्टर सोरेन द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई है, जो अब घाटशिला की गलियों में चर्चा का प्रमुख विषय बन चुकी है।

एक ओर मां, दूसरी ओर पिता – घाटशिला का अनोखा चुनावी समीकरण
यह उपचुनाव झारखंड की राजनीति में अपने आप में अनोखा है। एक ओर मां अपने बेटे के लिए जनता के बीच भावनात्मक अपील कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर पिता अपने बेटे के लिए विकास और नेतृत्व का चेहरा बनकर प्रचार कर रहे हैं।

  • झामुमो उम्मीदवार सोमेश सोरेन को उनकी मां और पूरा परिवार आगे बढ़ाने में जुटा है।

  • वहीं भाजपा उम्मीदवार बाबूलाल सोरेन के समर्थन में उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन प्रचार की कमान संभाले हुए हैं।

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इस प्रकार घाटशिला में राजनीतिक मुकाबला केवल पार्टियों या प्रत्याशियों के बीच नहीं, बल्कि “मां बनाम पिता” के प्रतीकात्मक संघर्ष के रूप में देखा जा रहा है।

जनता में सहानुभूति बनाम नेतृत्व की बहस
घाटशिला की गलियों और चाय दुकानों में अब चर्चा है — क्या इस बार जनता भावनाओं के साथ जाएगी या राजनीतिक अनुभव और नेतृत्व पर भरोसा करेगी? जहां सोमेश सोरेन के पक्ष में सहानुभूति की लहर दिख रही है, वहीं बाबूलाल सोरेन के पक्ष में पार्टी संगठन और चंपाई सोरेन का अनुभव बड़ा कारक माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक क्या कहते हैं
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव में भावनाएं और पारिवारिक त्याग प्रमुख मुद्दा बन सकता है। वहीं भाजपा घुसपैठ, धर्मांतरण और हेमंत सरकार के कुशासन के खिलाफ वोट मांग रही है। नतीजे चाहे जो हों, घाटशिला का यह उपचुनाव झारखंड की राजनीति में एक अलग उदाहरण के रूप में दर्ज होगा।

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