बाबूलाल मरांडी का सरकार पर सवाल: सिल्ली और हंटरगंज में आज भी पुल का अभाव, मरीजों को चारपाई पर नदी पार कर ले जाना पड़ रहा
मुख्य बिंदु:
-
बाबूलाल मरांडी ने रांची के सिल्ली और चतरा के हंटरगंज में पुल की कमी पर जताई चिंता
-
पुल के अभाव में ग्रामीणों को बांस की पुलिया और जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है
-
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने कार्यकाल की पुल योजनाओं का दिया हवाला
-
राज्य सरकार से जल्द पुल निर्माण की मांग
आज भी ग्रामीणों को झेलनी पड़ रही है बुनियादी सुविधाओं की कमी: मरांडी
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य के कई ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से राज्य के सिल्ली (रांची) और हंटरगंज (चतरा) जैसे क्षेत्रों में नदी पर पुल नहीं होने से हो रही परेशानी को उजागर किया।
“चारपाई पर मरीज, बांस की पुलिया से नदी पार करते ग्रामीण”
मरांडी ने कहा कि इन क्षेत्रों में आज भी लोग बांस की अस्थायी पुलिया के सहारे नदी पार करते हैं। मरीजों को अस्पताल ले जाने के लिए चारपाई पर लादकर नदी पार की जाती है। ये हालात राज्य के विकास पर सवाल खड़े करते हैं और सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों के प्रति उपेक्षा को उजागर करते हैं।
मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना: रांची की 3.25 लाख महिलाओं को ₹2500 की राशि जारी.
अपने कार्यकाल की योजनाओं का दिलाया स्मरण
बाबूलाल मरांडी ने याद दिलाया कि जब झारखंड राज्य का गठन हुआ था, तब ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में पुल-पुलिया की भारी कमी थी। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने इसे प्राथमिकता दी और सैकड़ों पुल-पुलियों का निर्माण कराया, जिससे पहली बार कई गांवों तक वाहन पहुंच सके।
सरकार से शीघ्र कार्रवाई की अपील
भाजपा नेता ने राज्य सरकार से मांग की है कि इन क्षेत्रों में शीघ्र पुल निर्माण कराया जाए। उन्होंने कहा कि पुलों की अनुपस्थिति केवल आवागमन की समस्या नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को भी बाधित करता है। विशेष रूप से मरीजों के लिए यह स्थिति गंभीर है, जिन्हें इलाज के लिए जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है।
बुनियादी ढांचे की अनदेखी बन रही समस्या
झारखंड जैसे राज्य में जहां भौगोलिक जटिलताएं हैं, वहां इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास अत्यंत आवश्यक है। बाबूलाल मरांडी की यह टिप्पणी न केवल सरकार को आईना दिखाती है बल्कि नीतिगत प्राथमिकताओं की पुनर्समीक्षा की भी मांग करती है।
