78 दिनों से रांची में धरने पर बैठे अनुबंध कर्मचारी, अब आत्महत्या की चेतावनी.

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78 दिन से रांची में धरना दे रहे अनुबंध कर्मचारी, अब आत्महत्या की चेतावनी


मुख्य बिंदु 

  • 78 दिनों से रांची में जारी है इंटरमीडिएट अनुबंध शिक्षकेत्तर कर्मियों का धरना

  • सरकार और राजभवन से अब तक नहीं हुई कोई बातचीत

  • कर्मचारियों ने जताया गहरा आक्रोश, आत्महत्या की चेतावनी

  • भीषण बारिश में भी डटे हैं प्रदर्शनकारी, कई बीमार

  • भिक्षाटन और जूता पॉलिश कर जताया विरोध

  • सामाजिक संगठनों ने जताई चिंता, की हस्तक्षेप की मांग



राजभवन के सामने 78 दिन से चल रहा धरना

रांची, झारखंड – राज्य के अंगीभूत महाविद्यालयों में कार्यरत इंटरमीडिएट अनुबंध शिक्षकेत्तर कर्मचारी बीते 78 दिनों से लगातार राजभवन के समक्ष धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। बावजूद इसके न तो राजभवन के किसी अधिकारी ने अब तक उनकी सुध ली है और न ही सरकार की ओर से कोई मंत्री या विधायक उनसे मिलने पहुंचे हैं।

प्रतीकात्मक विरोध: जूता पॉलिश और भिक्षाटन

धरने पर बैठे कर्मचारियों ने अपने विरोध को रचनात्मक तरीके से व्यक्त करने का प्रयास किया। उन्होंने जूता पॉलिश और भिक्षाटन जैसे कदम उठाकर अपनी उपेक्षा को उजागर किया, लेकिन राज्य प्रशासन और राजभवन ने उनके संघर्ष को अनदेखा कर दिया।

भुखमरी की स्थिति, अब आत्महत्या की चेतावनी

कर्मचारियों का कहना है कि वे भुखमरी की कगार पर पहुंच चुके हैं, और अब उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा है। जल्द ही वे एक गंभीर चेतावनी भरा पत्र राजभवन को सौंपने वाले हैं, जिसमें यह उल्लेख होगा कि यदि उनकी मांगों का शीघ्र समाधान नहीं हुआ, तो वे परिवार के साथ आत्महत्या करने को मजबूर होंगे

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मूसलाधार बारिश में भी डटे हैं धरने पर

रांची में लगातार हो रही बारिश के बावजूद कर्मचारी धरना स्थल पर पूरी दृढ़ता के साथ डटे हुए हैं। कई प्रदर्शनकारी बारिश में भीगकर बीमार भी हो चुके हैं, फिर भी उन्होंने प्रदर्शन छोड़ने से इनकार कर दिया है।

‘हमने शिक्षा बचाई, हमें क्यों निकाला गया?’

कर्मचारियों का कहना है कि जब कॉलेजों में स्टाफ की भारी कमी थी, तब हमने ही इंटरमीडिएट से लेकर स्नातकोत्तर तक की शिक्षा को जीवित रखा। अब जब हमारी आवश्यकता खत्म हो गई, तो हमें नौकरी से निकाल दिया गया, यह अन्यायपूर्ण है। उन्होंने सरकार से मानवता के आधार पर समाधान की मांग की है।

सामाजिक संगठनों का भी आया समर्थन

धरने को देखते हुए कई सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि राजभवन और सरकार इस मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, जबकि यह मानवीय और सामाजिक समस्या है। यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला और अधिक संवेदनशील रूप ले सकता है

अब राज्य सरकार की परीक्षा

सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार अब भी गूंगी-बहरी भूमिका में बनी रहेंगी, या फिर धरना दे रहे कर्मियों की पीड़ा को गंभीरता से लेकर कोई ठोस और मानवीय निर्णय लेंगी? आने वाले दिन राज्य की प्रशासनिक संवेदनशीलता और जवाबदेही की असली परीक्षा होंगे

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