झारखंडियत: हमारी शान, आदिवासियत: हमारी पहचान
झारखंड की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और संघर्षों से बनी है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा सोशल मीडिया पर साझा किए गए शब्द— “झारखंडियत हमारी शान है, आदिवासियत हमारी पहचान है, जल-जंगल-जमीन हमारा स्वाभिमान है”— राज्य के मूल्यों और भावनाओं को व्यक्त करते हैं। यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि झारखंड के आत्मसम्मान और अस्तित्व का प्रतीक है।

झारखंडियत: संघर्ष और स्वाभिमान की भावना
झारखंड राज्य का निर्माण लंबे संघर्षों और आंदोलनों के बाद हुआ। यहाँ की संस्कृति और परंपराएँ इसकी पहचान हैं। झारखंडी समाज में भाषा, खान-पान, वेशभूषा, पर्व-त्योहार और लोक कलाएं राज्य की असली झलक दिखाती हैं। झारखंडियत का अर्थ केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवनशैली और सोच में झलकती है।

आदिवासियत: संस्कृति और अस्तित्व की पहचान
झारखंड की आत्मा यहाँ के आदिवासी समुदायों में बसती है। संथाल, मुंडा, हो, उरांव, खड़िया, बिरहोर जैसी अनेक जनजातियाँ सदियों से अपनी परंपराओं को संजोए हुए हैं। उनकी भाषा, रीति-रिवाज, नृत्य-संगीत और सामाजिक ताना-बाना झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर है। इनकी विशिष्ट जीवनशैली और प्रकृति के साथ जुड़ाव ही ‘आदिवासियत’ को विशेष बनाता है।
जल-जंगल-जमीन: आत्मनिर्भरता का आधार
जल, जंगल और जमीन झारखंड के लोगों के लिए सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। यहाँ के आदिवासी समाज की आजीविका और परंपराएँ इन्हीं तीन तत्वों पर निर्भर हैं। जल की उपलब्धता कृषि और पीने के पानी का स्रोत है, जंगल से न सिर्फ भोजन और औषधियाँ मिलती हैं, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है। जमीन आदिवासियों के अस्तित्व का केंद्र रही है, जिसे बचाने के लिए उन्होंने कई आंदोलनों में हिस्सा लिया है।
झारखंड की अस्मिता और संघर्ष
झारखंड के लोगों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक संघर्ष किए हैं। बिरसा मुंडा का उलगुलान, सिद्धो-कान्हू का विद्रोह और टाना भगत आंदोलन, ये सभी इस भूमि की अस्मिता को बचाने के संघर्ष का हिस्सा रहे हैं। आज भी आदिवासी समाज अपने अधिकारों के लिए लड़ रहा है।
जय झारखंड: स्वाभिमान और संकल्प का उद्घोष
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शब्द न सिर्फ झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि राज्य की असली ताकत यहाँ के लोग और उनकी परंपराएँ हैं। झारखंड की पहचान को बनाए रखना और इसे आगे बढ़ाना हम सभी की जिम्मेदारी है। ‘जय झारखंड’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि हर झारखंडी के आत्मसम्मान और संकल्प का प्रतीक है।
