क्या झारखंड अपने भाषाई भविष्य को खोने की ओर बढ़ रहा है?

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झारखंड की भाषाएं संकट में: पहचान, परंपरा और शिक्षा पर मंडरा रहा खतरा

मुख्य बिंदु:

  • झारखंड की 9 पारंपरिक भाषाएं अस्तित्व संकट से जूझ रहीं

  • 10 में से केवल 6 विश्वविद्यालयों में ही पढ़ाई, वह भी अधूरी व्यवस्था में

  • वर्षों से नियुक्तियों का ठहराव, “नीड बेस्ड” शिक्षक भी स्थायित्व से वंचित

  • जेआरएफ/नेट छात्रों को नहीं मिल रहा शोध का अवसर

  • जनजातीय पर्वों को ‘नाच-गान’ कहकर किया जा रहा उपेक्षित

  • सरकार और विश्वविद्यालयों की चुप्पी भविष्य के लिए खतरनाक संकेत



सांस्कृतिक नहीं, यह अस्तित्व का संकट है

झारखंड की भाषाएं—कुड़ुख, मुंडारी, खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया, संताली, हो, कुरमाली और खड़िया—सिर्फ बोलचाल का माध्यम नहीं, बल्कि एक समृद्ध जीवनदर्शन और सांस्कृतिक पहचान की वाहक हैं। लेकिन मौजूदा दौर में ये भाषाएं सिर्फ उपेक्षा नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं।

नई शिक्षा नीति बनाम ज़मीनी हकीकत

हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा और जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की बात करती है, लेकिन झारखंड में इसका असर नगण्य है। प्रदेश के 10 विश्वविद्यालयों में से केवल 6 में इन भाषाओं का पठन-पाठन हो रहा है, और वह भी अधूरी व्यवस्था, सीमित संसाधन और शिक्षकों की भारी कमी के बीच।

Jharkhand tribal languages
हेमन्त अहीर, शिक्षक

शिक्षकों की सेवानिवृत्ति, पर कोई नई नियुक्ति नहीं

इन विभागों में दशकों से सेवा दे रहे प्रोफेसर एक-एक कर रिटायर हो रहे हैं। लेकिन उनके स्थान पर स्थायी शिक्षक नियुक्त नहीं किए जा रहे। “नीड बेस्ड” आधार पर नियुक्त कुछ शिक्षक अस्थायी रूप से शिक्षण कार्य संभाल रहे हैं, पर उन्हें अब तक न तो संस्थागत स्थायित्व मिला है और न ही समान अधिकार।

शोध और छात्रवृत्ति का गहराता संकट

नेट और जेआरएफ जैसी कठिन योग्यता परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थी भी मार्गदर्शन और रिसोर्स की कमी के चलते वर्षों तक शोध कार्य प्रारंभ नहीं कर पा रहे। यह प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की संभावना और आत्मविश्वास की क्षति है।

जब पर्वों को “नाच-गान” कहकर खारिज किया जाता है

झारखंड के जनजातीय पर्व जैसे सरहुल, करम, टुसू आदि अब भी विश्वविद्यालय परिसरों में विद्यार्थियों के प्रयासों से जीवित हैं। लेकिन जब अन्य विषयों के शिक्षक इन्हें “नाच-गान” कहकर उपेक्षित कर देते हैं, तो यह समावेशी शिक्षा की आत्मा पर आघात है।

अब भी समय है, फैसला लेने का

यह समय आत्ममंथन का है। राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री और कुलपतियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि झारखंड की भाषाएं केवल विरासत नहीं, बल्कि हमारे आज और कल की ज़िंदा अभिव्यक्ति हैं।

यदि अभी भी चुप्पी बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल ज़रूर करेंगी— हमने किस कीमत पर अपनी पहचान खो दी?

लेखक: हेमन्त अहीर
सहायक प्राध्यापक, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय, रांची

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