हेमंत सरकार पर रघुवर दास का तीखा हमला: कहा, विदेशी धर्म मानने वालों के दबाव में नहीं लागू हो रहा पेसा कानून
मुख्य बिंदु:
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रघुवर दास ने हेमंत सरकार पर आदिवासी हितों की उपेक्षा का आरोप लगाया
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पेसा कानून लागू नहीं करने को लेकर उठाए गंभीर सवाल
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विदेशी धर्म मानने वालों पर राज्य सरकार को दबाव में लेने का आरोप
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कांग्रेस-झामुमो पर वोट बैंक की राजनीति का आरोप
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सुदर्शन भगत ने 1961 की जनगणना से आदिवासी कोड हटाने पर कांग्रेस को घेरा
प्रेस वार्ता में बोले रघुवर दास, पेसा कानून को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल
भाजपा के वरिष्ठ नेता, पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल रघुवर दास ने मंगलवार को प्रदेश भाजपा कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी सरकार पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सरकार राज्य में पेसा कानून विदेशी धर्म मानने वालों के दबाव में लागू नहीं कर रही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या एक सरना समाज से आने वाले मुख्यमंत्री होते हुए भी आदिवासी समाज को पारंपरिक स्वशासन प्रणाली से वंचित रखना न्यायसंगत है?
बिरसा मुंडा और अन्य वीरों के बलिदान का किया उल्लेख
श्री दास ने कहा कि धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू और पोटो हो जैसे महापुरुषों ने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के लिए संघर्ष किया, अंग्रेजों से लड़ाइयां लड़ीं और अपने प्राणों का बलिदान दिया। लेकिन आज उसी स्वशासन व्यवस्था को हेमंत सरकार नजरअंदाज कर रही है।
झारखंड में अब तक क्यों नहीं लागू हुआ पेसा कानून?
उन्होंने बताया कि 1996 में केंद्र सरकार ने पेसा कानून लागू किया था और अधिकांश राज्यों ने अपनी पेसा नियमावली बनाई। लेकिन झारखंड में, हेमंत सरकार के करीब साढ़े पांच साल के शासन में भी यह कानून लागू नहीं किया गया है। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या पेसा कानून से सरकार को कोई खतरा है? क्या इसे लागू करने से सत्ता छिनने का डर है?”
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नियमावली तैयार, कानूनी सहमति के बावजूद अड़चन क्यों?
रघुवर दास ने कहा कि जुलाई 2023 में पेसा नियमावली का प्रारूप सार्वजनिक कर आम जनता और संस्थाओं से राय मांगी गई थी। विधि विभाग को भेजे गए प्रारूप पर 22 मार्च 2024 को महाधिवक्ता ने सहमति भी दी थी। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों के अनुरूप नियमावली तैयार हो चुकी है, बावजूद इसके उसे कैबिनेट में मंजूरी नहीं दी जा रही।
उन्होंने बताया कि क्षेत्रीय सम्मेलन में झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश समेत अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों ने भी नियमावली पर सहमति जताई थी। फिर भी नियमावली पर अमल नहीं हो रहा।
धर्मांतरण और पारंपरिक व्यवस्था में हस्तक्षेप का आरोप
श्री दास ने कहा कि पेसा कानून पारंपरिक आदिवासी स्वशासन पर आधारित है, इसमें निर्वाचित नहीं बल्कि परंपरागत ग्राम प्रधानों की भूमिका को मान्यता मिलती है। लेकिन विदेशी धर्म मानने वाले लोग इस पर आपत्ति कर रहे हैं क्योंकि वे प्रतिनिधित्व पाने के लिए 6ठी अनुसूची की तर्ज पर ऑटोनॉमस काउंसिल चाहते हैं, जहां नामांकन आधारित प्रतिनिधि बनाए जा सकें।
उन्होंने कहा कि 2010 से 2017 तक इन्हीं तत्वों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर पेसा कानून को 5वीं अनुसूची के तहत लागू करने का विरोध किया था, लेकिन कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया।
सरकार के भीतर मौजूद ताकतों पर भी साधा निशाना
रघुवर दास ने दावा किया कि राज्य सरकार के भीतर और सत्ता पक्ष में बैठे कुछ बड़े पदाधिकारी पेसा कानून लागू करने के विरोध में हैं। उनका कहना था कि कांग्रेस और झामुमो ने ऐसे लोगों को संरक्षण दे रखा है और अब सत्ता की गोद में बैठकर आदिवासी समाज के हितों से खिलवाड़ कर रहे हैं।
खनिज माफिया और सिंडिकेट भी विरोध में
उन्होंने कहा कि पेसा लागू होने से 112 अनुसूचित प्रखंडों में पारंपरिक ग्राम प्रधानों को विकास योजनाओं, बालू-पत्थर और अन्य लघु खनिजों पर अधिकार मिल जाएगा। यही कारण है कि बालू और पत्थर माफिया और सिंडिकेट भी इसका विरोध कर रहे हैं।
हेमंत सोरेन को दी चेतावनी, कहा – इतिहास माफ नहीं करेगा
रघुवर दास ने कहा कि यदि एक सरना धर्म से आने वाले मुख्यमंत्री के कार्यकाल में आदिवासी समाज के अधिकारों का हनन हुआ, तो इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार तत्काल पेसा नियमावली को कैबिनेट में पारित कर लागू करे।
धर्म कॉलम को फिर से फॉर्म में शामिल करने की मांग
उन्होंने यह भी मांग की कि जाति प्रमाण पत्र फॉर्म में धर्म का कॉलम, जो उनकी सरकार के समय जोड़ा गया था, उसे फिर से लागू किया जाए ताकि आदिवासी युवाओं की नौकरियां और शिक्षा में आरक्षण सुरक्षित रह सके।
सुदर्शन भगत का कांग्रेस पर हमला: 1961 की जनगणना से हटाया गया आदिवासी कोड
प्रेस वार्ता में पूर्व केंद्रीय मंत्री सुदर्शन भगत ने भी कांग्रेस और झामुमो पर आदिवासी समाज को भ्रमित करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 1961 की जनगणना में आदिवासी कोड हटाने वाली पार्टी कांग्रेस ही थी।
उन्होंने यह भी बताया कि 2012 में लोकसभा में पूछे गए उनके प्रश्न के उत्तर में तत्कालीन यूपीए सरकार और गृह मंत्रालय ने सरना कोड की मांग को “अव्यावहारिक” बताते हुए खारिज कर दिया था। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और झामुमो को आदिवासी धर्म-संस्कृति की कोई चिंता नहीं है, वे केवल वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं।
अन्य उपस्थित भाजपा नेता
प्रेस वार्ता में भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, प्रवक्ता रमाकांत महतो और सह प्रभारी अशोक बड़ाइक भी मौजूद थे।
