Ranchi- 86वें दिन धरने पर बैठे कर्मचारियों ने पकौड़ा बेच प्रदर्शन को दिया नया मोड़.

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रांची: अनुबंध शिक्षकेत्तर कर्मचारियों ने पकौड़ा बेचकर जताया विरोध, समायोजन की मांग पर अड़े

मुख्य बिंदु

लगातार 86वें दिन जारी रहा धरना

तख्तियों के साथ पकौड़ा बेचकर जताया सरकार पर असंतोष

450 से अधिक कर्मचारियों की नौकरी संकट में



राज्यभवन के समक्ष पकौड़ा प्रदर्शन

रांची- झारखंड अनुबंध महाविद्यालय शिक्षकेत्तर कर्मचारी संघ द्वारा राज्यभवन के समक्ष जारी धरना प्रदर्शन ने आज एक नया और रचनात्मक मोड़ ले लिया। धरना के 86वें दिन शिक्षकेत्तर कर्मचारियों ने सड़क पर तख्तियां लेकर पकौड़े बेचकर सरकार के प्रति विरोध दर्ज कराया

उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने समय रहते समायोजन की दिशा में निर्णय नहीं लिया, तो हम मजबूरी में यही करने को विवश होंगे।

नई शिक्षा नीति बनी कारण, नौकरी पर संकट

धरना में शामिल कर्मचारियों ने बताया कि नई शिक्षा नीति 2020 के तहत इंटरमीडिएट कक्षाओं को अंगीभूत महाविद्यालयों से हटा दिया गया, जिससे राज्यभर के लगभग 450 शिक्षकेत्तर कर्मचारियों की नौकरी खतरे में पड़ गई है।

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार ने जहां छात्रों को 10+2 विद्यालयों में समायोजित कर दिया, वहीं कर्मचारियों के भविष्य को लेकर अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।

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पहले भी किए अनूठे प्रदर्शन

संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि इस अनोखे विरोध से पहले भी उन्होंने भिक्षाटन, बूट पॉलिश और यज्ञ-हवन जैसे सांकेतिक कार्यक्रमों के जरिए सरकार को अपनी मांगों से अवगत कराया था, लेकिन राज्य सरकार ने अब तक कोई संज्ञान नहीं लिया।

मांग: कर्मचारियों का भी हो समायोजन

संघ की मुख्य मांग है कि जिस प्रकार छात्रों को नए विद्यालयों में स्थानांतरित किया गया, उसी प्रकार इन शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का भी अन्य विद्यालयों या महाविद्यालयों में समायोजन सुनिश्चित किया जाए।

संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द सकारात्मक पहल नहीं की, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप ले सकता है

रांची व कोल्हान विश्वविद्यालय के कर्मचारी भी शामिल

इस धरने में आज रांची विश्वविद्यालय और कोल्हान विश्वविद्यालय के कई शिक्षकेत्तर कर्मचारी भी शामिल हुए, जिन्होंने धरना स्थल पर पहुंचकर संघ के साथ एकजुटता प्रकट की

झारखंड में चल रहा यह प्रदर्शन सरकार के लिए एक चेतावनी है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर अगर मानव संसाधनों की अनदेखी की गई, तो यह गंभीर संकट में बदल सकता है। सरकार को चाहिए कि वह जल्द इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट और न्यायसंगत निर्णय ले, ताकि 450 से अधिक परिवारों के भविष्य को अंधकार में जाने से बचाया जा सके।

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