मुख्य बिंदु-
• संतों से सवाल पूछने पर अपमान लोकतंत्र और सनातन दोनों के लिए खतरा: दीपिका पांडेय सिंह
• शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ व्यवहार को बताया शर्मनाक
• सत्ता की आलोचना से विचलन को ‘अहंकार का शासन’ करार
• इतिहास गवाह, मर्यादा भूलने वाली सत्ता अपना पतन खुद तय करती है
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सत्ता और लोकतंत्र पर तीखा हमला
रांची- झारखंड की कैबिनेट मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए बयान में केंद्र की राजनीति और सत्ता के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता के शिखर पर बैठकर यह मान लिया गया है कि सवाल पूछने वालों को अपमानित किया जा सकता है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
सनातन परंपरा के अपमान का आरोप
दीपिका पांडेय सिंह ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुए कथित व्यवहार को केवल निंदनीय ही नहीं, बल्कि शर्मनाक बताया। उन्होंने कहा कि यह किसी एक संत का अपमान नहीं है, बल्कि उस सनातन परंपरा का अपमान है जिसने सदियों से सत्ता को सच का आईना दिखाने का साहस किया है।
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असहमति लोकतंत्र का मूल अधिकार
कैबिनेट मंत्री ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि असहमति लोकतंत्र का मूल अधिकार है, लेकिन अपमान किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता, खासकर तब जब बात संत परंपरा की हो। उन्होंने कहा कि जब सत्ता आलोचना से इतनी विचलित हो जाए कि संतों को रोका जाए, नोटिस थमाए जाएं और उनकी पहचान पर सवाल उठें, तो उसे सुशासन नहीं बल्कि अहंकार का शासन कहा जाना चाहिए।
इतिहास का हवाला और सख्त चेतावनी
दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि इतिहास इस बात का साक्षी है कि जो सत्ता मर्यादा भूल जाती है, वह अपने पतन की रेखा खुद खींच लेती है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस शुरू हो गई है और सत्ता बनाम संत परंपरा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
