सोने की चमक से आगे: गुलाबी कागज में छुपी एक पुरानी कहानी

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गुलाबी कागज में लिपटा सोना : एक मानवीय कहानी

शहर के पुराने बाज़ार में एक छोटी-सी सोनार की दुकान थी। लकड़ी का काउंटर, शीशे की अलमारी और दीवार पर टंगा पीतल का तराज़ू। उसी दुकान पर हर पीढ़ी की खुशियाँ आकर ठहरती थीं।
आज भी वही दुकान थी, और काउंटर के सामने खड़ी थी राधा—थोड़ी घबराई हुई, थोड़ी उत्साहित।
“पहली कमाई से सोना ले रही हूँ,” उसने धीमे से कहा।
सोनार काका मुस्कराए। उनके हाथों में अनुभव की झुर्रियाँ थीं। उन्होंने सोने की छोटी-सी अंगूठी तराज़ू से उठाई, कपड़े से पोंछा और फिर पास रखे गुलाबी कागज को मोड़ा।
राधा ने पूछ ही लिया,
“काका, सोना हमेशा इसी गुलाबी कागज में क्यों देते हैं?”
काका ने अंगूठी को धीरे-से कागज में लपेटते हुए कहा,
“बिटिया, सोना सिर्फ धातु नहीं होता… ये भरोसा होता है।”
उन्होंने कुर्सी खिसकाई, जैसे कोई पुरानी याद बैठ गई हो।
“जब तुम्हारी दादी अपनी शादी का कंगन लेने आई थीं, तब भी मैंने यही गुलाबी कागज निकाला था। उस दिन उनकी आँखों में डर था—नए घर का, नए रिश्तों का। मैंने सोचा, कम से कम सोना ऐसा लगे, जो सुकून दे।”
राधा चुपचाप सुनती रही।
“गुलाबी रंग,” काका बोले,
“सोने को और चमकदार दिखाता है, पर उससे ज़्यादा ये मन को सुकून देता है। लाल की तरह तेज़ नहीं, सफ़ेद की तरह ठंडा नहीं। बीच का रंग—जैसे उम्मीद।”
उन्होंने कागज को हल्का-सा दबाया।
“इसमें केमिकल नहीं होते, सोना खराब नहीं होता। पर असली बात ये है कि जब कोई इसे खोलता है, तो उसे लगता है—कुछ अच्छा है, कुछ शुभ है।”
राधा ने गुलाबी कागज में लिपटी अंगूठी हाथ में ली।
वो सिर्फ़ सोना नहीं था।
उसमें उसकी मेहनत थी, उसकी माँ की दुआ थी, और काका की सालों पुरानी परंपरा।
दुकान से निकलते वक्त राधा को लगा—
शायद इसी लिए, हर घर की तिजोरी में सोने से ज़्यादा यादें होती हैं।
और उन्हीं यादों को सँभालने के लिए, सोनार आज भी सोने को गुलाबी कागज में लपेट देता है।

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