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झारखंड में आदिवासी सीटों में भाजपा की हार से बाबूलाल का राजनीतिक क़द घटा।

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2019 के लोकसभा चुनाव में झारखंड में एनडीए ने 12 सीटों पर कब्जा जमाया था। विपक्ष के हिस्से में मात्र 02 सीटें गई थीं। 2024 के संसदीय चुनाव में एनडीए को मात्र 9 सीटें मिली हैं। 05 सीटों पर इंडिया गठबंधन ने जीत दर्ज की है। ये सभी पांच सीटें आदिवासियों के लिए रिजर्व एसटी कैटेगरी की सीट हैं।

Highlights-

  1. बाबूलाल को दिया गया फ्री हैंड।
  2. क्या होगा बाबूलाल का राजनीतिक भविष्य। 
  3. संगठन के अंदर भी दिखी नाराज़गी। 
  4. साल के आखिर में विधानसभा चुनाव। 

बाबूलाल को दिया गया फ्री हैंड।

झारखंड में लोकसभा चुनाव से काफी पहले झारखंड विकास मोर्चा का बीजेपी में विलय हो गया। बाबूलाल मरांडी को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष घोषित किया गया। बीजेपी को भरोसा था कि, एक आदिवासी चेहरा लाने से झारखंड में आदिवासी मूलवासी समाज के अंदर उनकी पैठ बढ़ेगी। बाबूलाल मरांडी को चुनाव के दौरान फ्री हैंड दिया गया। उम्मीदवारों के चयन से लेकर नीति निर्णय में बाबूलाल मरांडी की बातों को तरजीह दी गई। बावजूद इसके बाबूलाल मरांडी को कोई कमाल नहीं कर सके। उल्टे एनडीए की सीटें घट गईं।

क्या होगा बाबूलाल का राजनीतिक भविष्य। 

लोकसभा चुनाव के जो परिणाम सामने आए हैं। वे बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक भविष्य के लिए ठीक नहीं है। सभी पांच एसटी सीटों पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में बाबूलाल की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है। इस साल के आखिर में झारखंड में विधानसभा चुनाव भी प्रस्तावित है। ऐसे में पार्टी झारखंड में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर भी विचार कर सकती है।

संगठन के अंदर भी दिखी नाराज़गी। 

बाबूलाल मरांडी और संगठन में बैठे बड़े पदाधिकारी के कामकाज को लेकर भी सवाल उठे। पार्टी के प्रदेश महामंत्री एवं राज्यसभा सांसद आदित्य साहू को लेकर पार्टी में गहरी नाराजगी की बात सामने आई। पिछले दिनों आदित्य साहू ने हजारीबाग के पूर्व सांसद जयंत सिन्हा और धनबाद के विधायक राज सिन्हा को शो कॉज नोटिस जारी किया। यह पत्र मीडिया में भी प्रेषित किया गया। पार्टी के अंदर यह आवाज उठी कि चुनाव के दौरान ऐसे शो कॉज से पार्टी नेताओं का मनोबल गिरेगा। आदित्य साहू के कामकाज को लेकर भी सवाल उठाए गए।

शो कॉज का जयंत सिन्हा और राज सिन्हा ने जवाब भी दिया और इसे मीडिया में भी जारी कर दिया। इससे पार्टी के अंदर का मन मुटाव  पब्लिक डोमेन में आ गया। कमोबेश ये पहला मौका था जब पार्टी की अंदरूनी लड़ाई इस तरह से आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई।

साल के आखिर में विधानसभा चुनाव। 

बहरहाल, झारखंड में एनडीए के प्रदर्शन और आदिवासी सीटों पर बीजेपी की हार के बाद बाबूलाल मरांडी के संगठनात्मक योग्यता पर सवाल उठना लाजिमी है। यही वजह है कि, जानकार अभी से ही बीजेपी में बड़े परिवर्तन की बात कह रहे हैं। अक्टूबर नवंबर महीने में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले यह बदलाव मुमकिन है।

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