सरना-ईसाई बहस के बीच आदिवासी पहचान और जमीन के मूल मुद्दे हाशिये पर

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रांची। झारखंड में बीते कई महीनों से चल रहे “कुड़मी-महतो बनाम आदिवासी” और “सरना बनाम ईसाई” विवाद ने अब नया और अधिक संवेदनशील रूप ले लिया है। यह विवाद अब डिलिस्टिंग, धर्मांतरण और आरक्षण जैसे मुद्दों पर केंद्रित हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम पर सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद् के अध्यक्ष ग्लैडसन डुंगडुंग ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

ग्लैडसन डुंगडुंग का कहना है कि वे तथ्यों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और बौद्धिक प्रखरता के साथ इन मुद्दों पर लगातार सच सामने ला रहे हैं। इसी वजह से उन्हें जेएलकेएम से जुड़े सोशल मीडिया समूहों और जनजाति सुरक्षा मंच से जुड़े लोगों द्वारा निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि असहमति की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है, जबकि सवाल आदिवासी समाज के अस्तित्व और अधिकारों से जुड़े हैं।

डुंगडुंग ने कहा कि पिछले करीब 250 वर्षों से आदिवासी समाज जिन मूल मुद्दों के लिए संघर्ष करता आ रहा है, उनमें आदिवासी पहचान, स्वायत्तता, जमीन-जंगल-पानी और प्राकृतिक संसाधनों पर मालिकाना हक सबसे अहम हैं। लेकिन वर्तमान विमर्श में इन मूल प्रश्नों को हाशिये पर धकेल दिया गया है। इसके बजाय आरएसएस के एजेंडे से जुड़े धर्मांतरण, आरक्षण और डिलिस्टिंग जैसे मुद्दों को आदिवासी मुद्दे के रूप में पेश किया जा रहा है, जो वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के विमर्श से आदिवासी समाज के भीतर भ्रम और आपसी टकराव बढ़ रहा है, जिसका सीधा फायदा बाहरी ताकतों को मिल रहा है। डुंगडुंग के मुताबिक जरूरत इस बात की है कि आदिवासी समाज अपने ऐतिहासिक संघर्षों और संवैधानिक अधिकारों पर केंद्रित रहे, न कि ऐसे मुद्दों में उलझे जो उनके मूल सवालों को कमजोर करते हैं।

फिलहाल झारखंड में यह विवाद केवल सामाजिक बहस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर भी इसका असर दिखने लगा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बयानबाजी और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

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