चुनाव खत्म होते ही बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, भाकपा माले ने कहा- “जनता के साथ धोखा”
प्रमुख बातें
- पांच राज्यों के चुनाव खत्म होते ही पेट्रोल-डीजल महंगा
- भाकपा माले ने सरकार पर लगाया बड़ा आरोप
- मनोज भक्त बोले- चुनाव तक रोकी गई थीं कीमतें
- तेल कंपनियों पर मुनाफाखोरी का आरोप
- महंगाई के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी
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पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर फिर राजनीति तेज
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव समाप्त होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी को लेकर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। भाकपा माले के राज्य सचिव मनोज भक्त ने इसे आम जनता के साथ “धोखा” करार दिया है।
महेंद्र सिंह भवन स्थित पार्टी कार्यालय से जारी बयान में उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान तेल की कीमतों को नियंत्रित रखा गया और जैसे ही चुनाव खत्म हुए, जनता पर महंगाई का नया बोझ डाल दिया गया।
“जनता को संयम का पाठ, सरकार कर रही फिजूलखर्ची”
मनोज भक्त ने प्रधानमंत्री Narendra Modi पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार एक तरफ जनता से पेट्रोल-डीजल और सोना खरीदने में संयम बरतने की अपील कर रही है, जबकि दूसरी ओर खुद भारी फिजूलखर्ची कर रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि करोड़ों रुपये विशेष विमानों, बड़े-बड़े काफिलों और चुनावी प्रचार पर खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन आम जनता को महंगाई का बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
“कच्चा तेल सस्ता हुआ, फिर भी जनता को राहत नहीं”
भाकपा माले नेता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम नहीं की गईं। उन्होंने तेल कंपनियों पर भारी मुनाफाखोरी का आरोप लगाया।
मनोज भक्त का कहना है कि बड़े कॉरपोरेट घरानों और तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए आम लोगों से लगातार “लूट” की जा रही है।
गरीब, किसान और मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा असर
उन्होंने कहा कि लगातार बढ़ती महंगाई से आम लोगों की क्रय शक्ति कमजोर हो रही है। इसका सबसे ज्यादा असर गरीबों, मजदूरों, किसानों, छात्रों और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है।
भाकपा माले ने मांग की है कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ी हुई कीमतों को तुरंत वापस लिया जाए और तेल कंपनियों की मुनाफाखोरी पर रोक लगाई जाए।
आंदोलन की चेतावनी
पार्टी ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार इसी तरह महंगाई का बोझ जनता पर डालती रही, तो लोग सड़क पर उतरकर आंदोलन करेंगे।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या चुनाव खत्म होते ही बढ़ी ईंधन कीमतें सिर्फ संयोग हैं या फिर इसके पीछे कोई राजनीतिक रणनीति है?
